रंगे हाथ रिश्वत में पकड़े गए तो पूर्व अनुमति जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाई कोर्ट

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भ्रष्टाचार को ‘आधिकारिक कर्तव्य’ नहीं माना जा सकता

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा—रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े जाने पर PC Act की धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति जरूरी नहीं। भ्रष्टाचार को ‘आधिकारिक कर्तव्य’ नहीं माना जा सकता।


🔴 हाई कोर्ट का अहम फैसला

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार मामलों में एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए स्पष्ट किया है कि यदि आरोपी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा जाता है, तो Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 17A के तहत पूर्व स्वीकृति (prior sanction) आवश्यक नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार से जुड़े कृत्य “आधिकारिक कर्तव्य” (official duty) के दायरे में नहीं आते।


⚖️ धारा 7 PC Act और 61(2) BNSS पर स्पष्ट रुख

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकलपीठ ने कहा कि धारा 7 (PC Act) और धारा 61(2) BNSS (षड्यंत्र) के तहत अपराधों को सरकारी कर्तव्य के निर्वहन का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

इसलिए, ऐसे मामलों में Section 218 BNSS (पूर्व में CrPC की धारा 197) के तहत अतिरिक्त स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती।


📊 पहले से मिली स्वीकृति ही पर्याप्त

कोर्ट ने कहा कि यदि Section 19, PC Act के तहत अभियोजन स्वीकृति (prosecution sanction) पहले ही दी जा चुकी है, तो अलग से कोई अतिरिक्त स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं है।

साथ ही, षड्यंत्र (conspiracy) का अपराध मुख्य अपराध से अलग नहीं माना जाएगा।

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🚨 ट्रैप केस में पूर्व अनुमति की जरूरत नहीं

अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रैप मामलों (trap cases) में, जहां आरोपी को रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है, वहां धारा 17A के तहत पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती।

इस मामले में भी आरोपी Achche Lal को सीबीआई ने 25,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ा था।


🧾 केस का संक्षिप्त विवरण

मामला 3 फरवरी 2025 की शिकायत से शुरू हुआ, जिसमें आरोप था कि सहायक शाखा पोस्ट मास्टर (ABPM) पद पर जॉइनिंग के लिए 25,000 रुपये की रिश्वत मांगी गई।

सीबीआई ने जांच के बाद 4 फरवरी 2025 को ट्रैप बिछाया, जिसमें आरोपी को रिश्वत लेते हुए पकड़ लिया गया।

बाद में 30 जुलाई 2025 को अभियोजन स्वीकृति जारी की गई और ट्रायल कोर्ट ने 2026 में आरोप तय कर दिए।


⚠️ हाई कोर्ट ने याचिका खारिज की

आरोपियों ने आरोप तय करने और अभियोजन स्वीकृति की वैधता को चुनौती दी थी।

लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि या अवैधता नहीं है और याचिका में कोई दम नहीं है।


📜 सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें:

शामिल हैं। इन फैसलों में कहा गया है कि अभियोजन स्वीकृति की वैधता का परीक्षण ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए, न कि प्रारंभिक चरण में।

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🌐 भ्रष्टाचार पर सख्त संदेश

यह फैसला स्पष्ट करता है कि भ्रष्टाचार को किसी भी स्थिति में सरकारी कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी संकेत दिया कि तकनीकी आधारों पर भ्रष्टाचार मामलों को कमजोर नहीं किया जा सकता, खासकर जब आरोपी रंगे हाथ पकड़ा गया हो।


📌 निष्कर्ष

इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह निर्णय भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह फैसला जांच एजेंसियों को भी स्पष्ट दिशा देता है कि ट्रैप मामलों में पूर्व अनुमति की बाध्यता लागू नहीं होगी।


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