सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल छात्रवृत्ति घोटाले के कथित रिश्वत मामले में ईडी के पूर्व सहायक निदेशक को जमानत दी, हाईकोर्ट का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश छात्रवृत्ति रिश्वत मामले में ईडी के पूर्व सहायक निदेशक विशाल दीप को जमानत देते हुए पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को पलटा। कोर्ट ने कहा—चार्जशीट दायर होने और लंबी हिरासत के बाद आरोपी की निरंतर जेल में रखे जाने की आवश्यकता नहीं।


सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के पूर्व अधिकारी को दी जमानत, हाईकोर्ट का आदेश किया रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हिमाचल प्रदेश छात्रवृत्ति घोटाले से जुड़े कथित रिश्वत मामले में महत्वपूर्ण आदेश देते हुए प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पूर्व सहायक निदेशक विशाल दीप को जमानत दे दी। शीर्ष अदालत ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें जमानत देने से इनकार कर दिया गया था।

इस जमानत आदेश को न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की दो-judge बेंच ने पारित किया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दायर हो चुकी है, वह लंबे समय से हिरासत में है, और अब उसकी निरंतर जेल में उपस्थिति का कोई औचित्य नहीं बचता।

चार्जशीट दाखिल होने के बाद हिरासत का औचित्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

कोर्ट ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और अब मुकदमे की कार्यवाही में आरोपी का सहयोग अपेक्षित है। ऐसे में उसकी हिरासत बनाए रखना अनावश्यक और अवांछित पूर्व-ट्रायल सज़ा के समान होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि विशाल दीप को जमानत पर रिहा किया जाए और जमानत की शर्तें ट्रायल कोर्ट तय करेगा।


मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला सीबीआई की एंटी-करप्शन ब्रांच (चंडीगढ़) द्वारा 22 दिसंबर 2024 को दर्ज की गई एफआईआर FIR से जुड़ा है।
एफआईआर में निम्न धाराएँ शामिल हैं:

  • धारा 7A और 12, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988
  • धारा 61(2) और 238, भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita), 2023
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आरोपों के अनुसार, निजी शैक्षणिक संस्थानों को मिले छात्रवृत्ति फंड की जांच में कथित तौर पर रिश्वत लेकर हेरफेर की जा रही थी।

सीबीआई का आरोप था कि जांच में ढील देने, गिरफ्तारी को प्रभावित करने और कार्रवाई को अपने मनमाफिक मोड़ देने के लिए अवैध वसूली का जाल रचा गया था।


हाईकोर्ट ने क्यों किया था जमानत से इनकार?

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने जुलाई 2025 के अपने आदेश में जमानत इस आधार पर ठुकराई थी:

  • आरोप संस्थागत ईमानदारी की जड़ों पर वार करते हैं
  • आरोपी द्वारा कथित रूप से—
    • एन्क्रिप्टेड ऐप्स का उपयोग,
    • फर्जी पहचानें बनाना,
    • परिवार के वाहनों का उपयोग—
      ये सभी योजनाबद्ध और सोची-समझी रणनीति को दर्शाते हैं

हाईकोर्ट ने माना था कि “अवैध लाभ लेने की कोशिश” एक बेहद गंभीर अपराध है, जो जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता को हानि पहुंचाता है।


सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

रक्षा पक्ष ने तर्क दिया:

  • चार्जशीट दाखिल हो चुकी है
  • आरोपी का जेल में रहना अब बेकार है
  • हिरासत का उद्देश्य सिर्फ जांच में सहयोग सुनिश्चित करना होता है
  • यह मामला “अति-लंबी प्री-ट्रायल डिटेंशन” का उदाहरण बन रहा है

सीबीआई की ओर से ASG राजा ठाकरे ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि:

  • मामला गंभीर है
  • यह सत्ता के दुरुपयोग और समन्वित भ्रष्ट आचरण का मामला है

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि:

  • जांच समाप्त हो चुकी है
  • आरोपी कई महीने से हिरासत में है
  • ट्रायल लंबा चल सकता है

इसलिए अब आरोपी की जेल में निरंतर मौजूदगी आवश्यक नहीं।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने दो बातें स्पष्ट कीं:

  1. चार्जशीट दाखिल होने के बाद लंबी हिरासत न्यायोचित नहीं, जब तक कोई विशेष कारण न हो।
  2. ट्रायल कोर्ट स्वतंत्र रूप से मामले की सुनवाई करेगा, बिना हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी अवलोकन से प्रभावित हुए।
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इस तरह, आरोपी विशाल दीप को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली और मामला अब ट्रायल कोर्ट के समक्ष आगे बढ़ेगा।

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