चेक बाउंस मामले में तीसरे पक्ष को नहीं है मुकदमा दायर करने का अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस की आपराधिक शिकायत केवल पेयी या विधिसम्मत धारक ही दायर कर सकता है, कोई तीसरा पक्ष केवल प्रभावित होने के आधार पर नहीं।

चेक बाउंस मामले में तीसरे पक्ष को नहीं है मुकदमा दायर करने का अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत चेक अनादरण से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को लेकर एक महत्वपूर्ण स्पष्टता प्रदान की है। अदालत ने कहा है कि कोई भी तीसरा पक्ष, केवल इस आधार पर कि वह संबंधित लेनदेन से प्रभावित हुआ है, चेक बाउंस की आपराधिक शिकायत दायर नहीं कर सकता

कोर्ट ने दो टूक कहा कि ऐसे मामलों में केवल चेक का “पेयी” या “होल्डर इन ड्यू कोर्स” (विधिसम्मत धारक) ही अभियोजन शुरू करने का वैधानिक अधिकार रखता है।

मामला क्या था?

यह विवाद 22 लाख रुपये की कुल राशि से जुड़े 11 चेकों के अनादरण से उत्पन्न हुआ था। एक साझेदारी फर्म ने अपने एक साझेदार के माध्यम से धारा 138 के तहत आपराधिक शिकायत दायर की थी, जबकि ये चेक किसी अन्य इकाई के नाम पर जारी किए गए थे

शिकायतकर्ता का तर्क था कि दोनों इकाइयों के बीच एक व्यावसायिक व्यवस्था थी और एक मौखिक वाणिज्यिक समझौते के आधार पर उसे अप्रत्यक्ष रूप से भुगतान पाने का अधिकार था। इसी आधार पर उसने चेक बाउंस की कार्यवाही शुरू की।

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आरोपियों की आपत्ति

आरोपियों ने कार्यवाही को चुनौती देते हुए कहा कि:

  • शिकायतकर्ता का नाम किसी भी चेक पर दर्ज नहीं है
  • वह न तो चेक का पेयी है और न ही विधिक रूप से उसका धारक

इसलिए, उसके द्वारा दायर शिकायत कानूनन असंवहनीय है।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति समित गोपाल ने एनआई एक्ट की धारा 138 और धारा 142 का विस्तृत परीक्षण किया। कोर्ट ने कहा कि धारा 142 एक सख्त वैधानिक प्रवेश-बिंदु (strict statutory threshold) निर्धारित करती है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में साफ तौर पर कहा गया है कि—

“धारा 138 के तहत दंडनीय किसी भी अपराध का संज्ञान न्यायालय तभी ले सकता है, जब पेयी या चेक के विधिसम्मत धारक द्वारा लिखित शिकायत की गई हो।”

कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि यद्यपि कोई अधिकृत प्रतिनिधि शिकायत दाखिल कर सकता है, लेकिन कार्यवाही अनिवार्य रूप से पेयी या होल्डर इन ड्यू कोर्स के नाम पर ही शुरू होनी चाहिए।

‘अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित’ होना पर्याप्त नहीं

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस दलील को खारिज किया कि लेनदेन से “अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित” व्यक्ति को भी धारा 138 के तहत अभियोजन का अधिकार मिल सकता है। अदालत ने कहा कि ऐसी व्याख्या कानून के स्पष्ट शब्दों के विपरीत होगी

इसी आधार पर कोर्ट ने शिकायत को विधिक रूप से असंवहनीय मानते हुए समन जारी करने के आदेश को रद्द कर दिया।

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यह फैसला चेक बाउंस मामलों में लोकस स्टैंडी (मुकदमा दायर करने के अधिकार) को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।


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