सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी और नाबालिग बेटी को भरण-पोषण न देने पर पति के नियोक्ता को उसकी सैलरी से हर महीने ₹25,000 काटकर पत्नी के खाते में RTGS से ट्रांसफर करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि पत्नी अकेले बच्चे की देखभाल कर रही है।
एक महत्वपूर्ण वैवाहिक विवाद में Supreme Court ने पति द्वारा पत्नी और नाबालिग बेटी के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से लगातार बचने पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने पति के नियोक्ता को निर्देश दिया कि वह उसके वेतन से हर महीने ₹25,000 काटकर पत्नी के बैंक खाते में RTGS के माध्यम से जमा करे।
यह आदेश न्यायमूर्ति J.B. Pardiwala और न्यायमूर्ति K.V. Viswanathan की खंडपीठ ने दिया। अदालत ने पाया कि पति ने पहले दिए गए न्यायिक आदेशों का भी पालन नहीं किया था।
अदालत के पहले के आदेश का पालन नहीं
सुनवाई के दौरान अदालत ने अपने 16 दिसंबर 2025 के आदेश का उल्लेख किया। उस आदेश में कोर्ट ने कहा था कि दंपति वर्ष 2022 से अलग रह रहे हैं और उनकी चार वर्ष की एक बेटी है।
कोर्ट ने उस समय यह भी टिप्पणी की थी कि पति ने न तो अपनी पत्नी को और न ही अपनी नाबालिग बेटी को कोई आर्थिक सहायता दी है। अदालत ने यह भी कहा था कि पिछले चार वर्षों में उसने अपनी बेटी से मिलने की भी कोशिश नहीं की।
पीठ ने उस समय कहा था कि इस मामले में विवाह का अपरिवर्तनीय टूटना (Irretrievable Breakdown of Marriage) दिखाई देता है। पत्नी ने भी स्पष्ट किया था कि वह अपने वैवाहिक घर वापस नहीं जाना चाहती और उसने 40 लाख रुपये की एकमुश्त राशि को पूर्ण और अंतिम समझौते के रूप में प्रस्तावित किया था।
यात्रा खर्च के लिए जमा करने थे ₹25,000
16 दिसंबर 2025 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने पति को निर्देश दिया था कि वह ₹25,000 कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा करे, ताकि पत्नी और नाबालिग बेटी के यात्रा खर्च का प्रबंध किया जा सके।
साथ ही, मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा गया था ताकि पक्षकारों के बीच एकमुश्त समझौते की राशि तय की जा सके।
हालांकि, अदालत ने पाया कि पति ने इस आदेश का भी पालन नहीं किया और निर्धारित राशि जमा नहीं की।
अंतरिम भरण-पोषण का भी बकाया
सुनवाई के दौरान अदालत को यह भी बताया गया कि वर्ष 2024 में 8th Additional Chief Judicial Magistrate Court Nashik द्वारा अंतरिम भरण-पोषण का आदेश दिया गया था।
इसके बावजूद पति ने उस आदेश का पालन नहीं किया और ₹1,38,000 का बकाया हो गया।
पति की आय का आकलन
अदालत के समक्ष पति ने अपने आय संबंधी हलफनामे में बताया कि वह Rishad Shipping and Clearing Agency Pvt. Ltd. में कार्यरत है और उसका मासिक वेतन लगभग ₹50,000 है, जबकि वार्षिक आय लगभग ₹6 लाख है।
अदालत ने पति से पूछा कि क्या वह ₹2,50,000 की राशि जमा करने को तैयार है, जिसमें ₹1,38,000 का बकाया अंतरिम भरण-पोषण भी शामिल था।
लेकिन पति ने साफ तौर पर कोई भी राशि देने से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश
इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचता।
अदालत ने आदेश दिया कि पति के नियोक्ता को उसके वेतन से हर महीने ₹25,000 काटकर पत्नी के खाते में RTGS के माध्यम से जमा करना होगा।
बेटी के हित को बताया महत्वपूर्ण
पीठ ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि दंपति की नाबालिग बेटी की देखभाल पूरी तरह पत्नी अकेले कर रही है।
अदालत ने कहा कि बच्चे के हितों की रक्षा करना न्यायालय का महत्वपूर्ण दायित्व है।
मामले को अब 21 अप्रैल 2026 को सूचीबद्ध किया गया है, जब अदालत इस आदेश के अनुपालन की स्थिति पर रिपोर्ट प्राप्त करेगी।
यह आदेश D v. N, 2026 SCC OnLine SC 337 मामले में पारित किया गया।
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