न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्ण गवई ने भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ली

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न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्ण गवई ने भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ली

पहले बौद्ध और दलित समुदाय से दूसरे CJI; राष्ट्रपति भवन में हुआ शपथ ग्रहण समारोह

नई दिल्ली, 14 मई: न्यायमूर्ति भूषण रामकृष्ण गवई ने मंगलवार को भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ली। उन्होंने न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के सेवानिवृत्त होने के एक दिन बाद पदभार संभाला। गवई देश के पहले बौद्ध मुख्य न्यायाधीश बने हैं, और दलित समुदाय से यह पद संभालने वाले सिर्फ दूसरे व्यक्ति हैं—उनसे पहले न्यायमूर्ति के. जी. बालाकृष्णन ने वर्ष 2007 में यह जिम्मेदारी निभाई थी।

शपथ ग्रहण समारोह राष्ट्रपति भवन में हुआ, जहां राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।


संक्षिप्त कार्यकाल, लेकिन ऐतिहासिक महत्व

न्यायमूर्ति गवई का कार्यकाल करीब छह महीने का होगा। वे 23 नवंबर 2025 को 65 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर सेवानिवृत्त होंगे। वे न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ के उत्तराधिकारी न्यायमूर्ति संजीव खन्ना के स्थान पर आए हैं, जिन्होंने केवल छह महीने तक मुख्य न्यायाधीश का पद संभाला।


संविधान ने मेरी नियति बदल दी: गवई

न्यायमूर्ति गवई संविधान की समावेशी भावना और सामाजिक न्याय के मूल्यों के खुले प्रशंसक रहे हैं। उन्होंने पूर्व में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था कि,

“भारत के संविधान ने मुझे वह बनाया जो मैं आज हूं।”
वे सामाजिक न्याय, वंचितों के अधिकार और न्यायपालिका की निष्पक्षता के प्रबल पक्षधर माने जाते हैं।


व्यक्तित्व और न्यायिक दृष्टिकोण

न्यायमूर्ति गवई का न्यायिक दृष्टिकोण संविधानवाद, मानवाधिकारों और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर आधारित रहा है। वे सर्वोच्च न्यायालय में कई प्रमुख पीठों का हिस्सा रहे हैं और संविधान पीठों में भी योगदान दे चुके हैं।

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ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक महत्व

उनकी नियुक्ति न केवल न्यायपालिका में विविधता और प्रतिनिधित्व की दिशा में एक मजबूत संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भारत का संवैधानिक ढांचा किस तरह सामाजिक समावेशन को प्रोत्साहित करता है।

गवई की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब न्यायपालिका संवैधानिक मूल्यों की रक्षा, अदालतों में पारदर्शिता और सामाजिक न्याय को लेकर केंद्र में है।

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