इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 528 (पूर्व धारा 482 CrPC) के तहत FIR तभी क्वैश (FIRQuashing) की जा सकती है जब चार्जशीट व संज्ञान कोर्ट रिकॉर्ड पर हों। Pradnya Pranjal Kulkarni फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने आवेदन को गैर-रक्षित व अमान्य बताते हुए खारिज कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट: चार्जशीट और संज्ञान रिकॉर्ड पर न हों तो BNSS 528 के तहत FIR क्वैश नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा कि केवल FIR को आधार बनाकर BNSS की धारा 528 (पुरानी धारा 482 CrPC) के तहत FIR को क्वैश नहीं किया जा सकता, जब तक कि—
- चार्जशीट दाखिल न हो,
- कंपिटेंट कोर्ट द्वारा संज्ञान न लिया गया हो, और
- दोनों को रिकॉर्ड पर प्रस्तुत न किया गया हो।
एकल पीठ—जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा—ने स्पष्ट कहा कि आवेदन “रखने योग्य ही नहीं” (not maintainable) है।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक ने धारा 528 BNSS के तहत FIR क्वैश करने की मांग की थी। FIR में IPC की धारा 420, 467, 468 और 471 के आरोप लगे थे।
आवेदक का तर्क:
- यह FIR एब्यूज़ ऑफ प्रोसेस है।
- इसी तरह के तथ्य पर 2022 में पहले एक FIR दर्ज हो चुकी है।
- उस मामले में चार्जशीट दायर हो चुकी है और संज्ञान भी लिया जा चुका है।
लेकिन आवेदक ने इस केस की चार्जशीट या संज्ञान आदेश रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया।
कोर्ट का विश्लेषण
🔹 1. Pradnya Pranjal Kulkarni निर्णय का संदर्भ
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का हवाला देकर कहा:
FIR को क्वैश करने का अधिकार दो रास्तों से है—
(i) Article 226, और
(ii) Section 528 BNSS (पूर्व धारा 482 CrPC)।
लेकिन दूसरा रास्ता तभी उपलब्ध है जब चार्जशीट + संज्ञान दोनों रिकॉर्ड पर हों।
🔹 2. बिना चार्जशीट-संज्ञान के धारा 528 का प्रयोग नहीं
कोर्ट ने कहा:
“आवेदक ने न चार्जशीट और न संज्ञान आदेश रिकॉर्ड पर रखा है। अतः धारा 528 BNSS के तहत FIR क्वैश करने का आवेदन सुनवाई योग्य ही नहीं है।”
🔹 3. मेरिट पर विचार की आवश्यकता नहीं
क्योंकि आवेदन maintainable ही नहीं था, कोर्ट ने कहा:
“मामले के मेरिट में जाने का कोई प्रश्न नहीं उठता।”
अंतिम निर्णय
- आवेदन खारिज।
- FIR को क्वैश न करने का आदेश यथावत।
- कोर्ट ने दोहराया:
BNSS 528 (पुरानी धारा 482) का उपयोग तभी जब
चार्जशीट + संज्ञान = रिकॉर्ड पर मौजूद हों।
Case Title- Vishwa Bandhu v. State of U.P. and 3 Others
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