झूठे मामलों पर कार्रवाई की मांग: सुप्रीम कोर्ट में पीड़ितों को शिकायत का अधिकार देने की अपील

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झूठे आपराधिक मामलों के खिलाफ पीड़ितों को शिकायत दर्ज कराने का अधिकार देने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में BNSS की धाराओं 215 और 379 की व्याख्या को लेकर दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है।

झूठे आपराधिक मामलों के खिलाफ पीड़ितों को सीधे शिकायत दर्ज कराने का अधिकार देने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में अदालत से अनुरोध किया गया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की कुछ धाराओं की उद्देश्यपूर्ण और समन्वित व्याख्या करते हुए ऐसे निर्देश जारी किए जाएं, जिससे झूठे मामलों से प्रभावित व्यक्ति भी न्यायिक कार्रवाई शुरू कर सकें।

यह याचिका अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दाखिल की गई है। इसमें कहा गया है कि वर्तमान कानूनी ढांचा कई मामलों में झूठे आरोपों से पीड़ित लोगों को शिकायत दर्ज कराने या दोषियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने से रोक देता है।

याचिका ऐसे समय में दायर की गई है जब उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में एक ही परिवार के तीन सदस्यों द्वारा कथित तौर पर आत्महत्या किए जाने की घटना सामने आई। याचिका में इस घटना का हवाला देते हुए कहा गया है कि परिवार को कथित रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत झूठे मामले में फंसाने की धमकी दी गई थी।

याचिका के अनुसार, फतेहपुर जिले के चौफेरावा गांव में 11 मार्च को हुई इस घटना में एक महिला, उसके बेटे और परिवार के एक अन्य सदस्य ने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली। इसमें दावा किया गया है कि बेटे द्वारा आत्महत्या से पहले लिखे गए कथित पत्र में वित्तीय लेनदेन को लेकर झूठे एससी/एसटी मामले में फंसाने की धमकी का जिक्र किया गया था।

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याचिका में अदालत से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 और धारा 379 की “उद्देश्यपूर्ण और समन्वित व्याख्या” के लिए दिशा-निर्देश जारी करने का अनुरोध किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन धाराओं की मौजूदा शाब्दिक व्याख्या झूठी सूचना, झूठे मामलों, फर्जी प्रमाणपत्र, गलत बयान और झूठे साक्ष्य के खिलाफ प्रभावित व्यक्ति को सीधे शिकायत दर्ज करने से रोकती है।

याचिका में कहा गया है कि धारा 215 लोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवहेलना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराधों और अदालत में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत दस्तावेजों से जुड़े अपराधों के अभियोजन से संबंधित है। वहीं धारा 379 के प्रावधानों का भी हवाला देते हुए कहा गया है कि मौजूदा प्रक्रिया में प्रभावित व्यक्ति को शिकायतकर्ता के रूप में आगे बढ़ने की स्पष्ट अनुमति नहीं मिलती।

याचिका में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों का भी उल्लेख किया गया है। इसमें कहा गया है कि झूठी सूचना, झूठे मामलों, फर्जी प्रमाणपत्र और झूठे साक्ष्यों से जुड़े अपराधों का अलग से व्यवस्थित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जबकि भारतीय दंड संहिता और नए आपराधिक कानूनों के तहत ऐसे कृत्य अपराध की श्रेणी में आते हैं।

याचिका का दावा है कि इस स्थिति के कारण पुलिस थानों और अदालतों पर झूठे मामलों का बोझ बढ़ता जा रहा है। इससे न केवल न्याय प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, बल्कि निर्दोष व्यक्तियों को लंबी कानूनी प्रक्रिया, आर्थिक नुकसान और मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है।

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याचिकाकर्ता ने कहा है कि कई मामलों में दर्ज मुकदमों की संख्या और अंततः बरी होने वाले लोगों की संख्या के बीच बड़ा अंतर देखने को मिलता है। दोषसिद्धि दर कम होने को भी इस समस्या का संकेत बताते हुए याचिका में कहा गया है कि झूठे मामलों के खिलाफ प्रभावी कानूनी उपाय उपलब्ध कराना जरूरी है।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे ताकि झूठे मामलों से प्रभावित व्यक्ति भी शिकायत दर्ज कर सकें और दोषियों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित हो सके।

अब इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के विचार और संभावित सुनवाई से यह तय होगा कि झूठे मामलों के खिलाफ कानूनी उपायों को लेकर न्यायिक स्तर पर कोई नया मार्गदर्शन सामने आता है या नहीं।

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