एसएसपी हरदोई को 3 हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने का आदेश, एफआईआर में “फिल्मी संवादों” को दोहराया जा रहा है
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हरदोई के गौहत्या मामले में दर्ज FIR को “फिल्मी स्क्रिप्ट” जैसा बताते हुए यूपी पुलिस को फटकार लगाई। कोर्ट ने एसएसपी हरदोई को 3 हफ्ते में हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया।
Allahabad High Court ने गौहत्या के एक मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए तीखी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि संबंधित एफआईआर की भाषा इतनी नाटकीय और बढ़ा-चढ़ाकर लिखी गई है कि वह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसी प्रतीत होती है।
जस्टिस Abdul Moin और जस्टिस Babita Rani की खंडपीठ ने एफआईआर की सामग्री पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या पुलिस वास्तविक घटनाओं के आधार पर एफआईआर तैयार कर रही है या फिर “फिल्मी संवादों” को दोहराया जा रहा है।
पीठ ने टिप्पणी की, “या तो पुलिसकर्मियों के सामने कोई स्क्रिप्ट रखी होती है और वे उसमें मामूली बदलाव कर उसे अपना लेते हैं, या फिर पुलिसकर्मियों में गंभीर गड़बड़ी है, जिसके चलते इस तरह की फिल्मी शैली की एफआईआर दर्ज की जा रही हैं।”
क्या है मामला?
मामला हरदोई जिले के तड़ियावां थाना क्षेत्र में 2 जनवरी को दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। अलीम नामक व्यक्ति ने इस एफआईआर को हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
एफआईआर के अनुसार, थाना प्रभारी को एक वीडियो प्राप्त हुआ जिसमें कथित तौर पर गौहत्या दिखाई गई थी। वीडियो देखने के दौरान पुलिस को एक “गुप्त सूचना” मिली कि वीडियो में दिख रहा व्यक्ति कुख्यात गौ तस्कर है और पास के इलाके में फिर अपराध करने वाला है।
पुलिस टीम बताए गए स्थान पर पहुंची। एफआईआर के मुताबिक, वहां किसी के चिल्लाने की आवाज आई—“पुलिस आ गई, भागो।” फिर एक अन्य आवाज ने कथित तौर पर कहा, “पुलिस वाले बिना मारे पीछा नहीं छोड़ेंगे।”
आगे उल्लेख है कि पुलिस पर गोली चलाई गई और एक सब-इंस्पेक्टर के कान के पास से गोली निकल गई। जवाबी फायरिंग में एक व्यक्ति घायल मिला, जिसने अपना नाम एडू बताया और कथित रूप से अपराध स्वीकार किया। उसने यह भी दावा किया कि अलीम सहित अन्य लोग मौके से फरार हो गए।
कोर्ट को क्यों हुआ संदेह?
हाईकोर्ट ने पाया कि एफआईआर की भाषा और घटनाक्रम गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं। अदालत ने यह भी नोट किया कि पुलिस पर गोली चलाने वाला एकमात्र व्यक्ति वही घायल आरोपी बताया गया है।
कोर्ट ने कहा कि एफआईआर में ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं है जिससे यह स्थापित हो कि अलीम गोलीबारी में या भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत किसी विशिष्ट अपराध में कैसे शामिल था।
पीठ ने गौहत्या के एक अन्य मामले में दर्ज इसी तरह की एफआईआर का भी हवाला दिया और संकेत दिया कि ऐसे मामलों में कथानक एक जैसा प्रतीत होता है।
एसएसपी हरदोई को नोटिस
एफआईआर में पाई गई खामियों को गंभीर मानते हुए अदालत ने हरदोई के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को तीन सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल कर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है।
कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि निर्धारित समय में हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो एसएसपी को संबंधित रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना होगा।
व्यापक संदेश
हाईकोर्ट की यह टिप्पणी केवल एक मामले तक सीमित नहीं मानी जा रही। आदेश से स्पष्ट संकेत मिलता है कि अदालतें आपराधिक मामलों में दर्ज एफआईआर की भाषा, तथ्यों की विश्वसनीयता और आरोपों की ठोसता की गंभीरता से समीक्षा कर रही हैं।
यदि जांच एजेंसियां तथ्यात्मक आधार के बजाय नाटकीय शैली अपनाती हैं, तो इससे अभियोजन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।
अब निगाहें एसएसपी द्वारा दाखिल किए जाने वाले हलफनामे और अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत यह तय करेगी कि एफआईआर में दर्ज कथित खामियां कितनी गंभीर हैं।
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