सुप्रीम कोर्ट: पुलिस स्टेशन में किए गए इकबाल-ए-जुर्म पर भरोसा नहीं, हत्या केस में सभी आरोपी बरी

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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस स्टेशन में पुलिस अधिकारियों और अन्य लोगों के सामने किया गया इकबाल-ए-जुर्म (Extrajudicial Confession) सबूत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कर्नाटक के एक हत्या मामले में सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

🚨 सुप्रीम कोर्ट: पुलिस स्टेशन में किए गए इकबाल-ए-जुर्म पर भरोसा नहीं, हत्या केस में सभी आरोपी बरी


सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि पुलिस स्टेशन में पुलिस अधिकारियों और अन्य व्यक्तियों के समक्ष आरोपी द्वारा किया गया इकबाल-ए-जुर्म (Extrajudicial Confession) विश्वसनीय सबूत नहीं है और उस पर दोषसिद्धि आधारित नहीं हो सकती।

जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने कर्नाटक के एक हत्या मामले में निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए आरोपियों को बरी कर दिया।


मामला क्या था?

प्रकरण के अनुसार, एक पुलिसकर्मी (पहला आरोपी) ने मृतक, जो कि दूसरे पुलिस अधिकारी थे, से कर्ज लिया था। लगातार वसूली की मांग से परेशान होकर उसने कथित रूप से अपनी पत्नी, भाई और साले की मदद से मृतक की हत्या करवाई।

आरोप था कि मृतक को पैसे लौटाने के बहाने घर बुलाया गया और फिर उस पर मिर्च पाउडर डालकर चॉपर से हमला कर दिया गया। अगली सुबह, आरोपी पत्नी (A2) ने सीधे पुलिस स्टेशन जाकर थानेदार को घटना की जानकारी दी और शव की मौजूदगी बताई।

ट्रायल कोर्ट ने पहले आरोपी को बरी कर दिया, लेकिन पत्नी और अन्य सह-आरोपियों (A2 से A4) को IPC धारा 302/34 के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा।

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सुप्रीम कोर्ट की दलीलें

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि:

  • मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) पर आधारित था।
  • कथित प्रत्यक्षदर्शी गवाह hostile हो गए।
  • हत्या का स्पष्ट मकसद (Motive) साबित नहीं हुआ।
  • मृतक के घर से निकलने या आरोपी के घर जाने की ठोस पुष्टि नहीं मिली।
  • पुलिस स्टेशन में किया गया इकबाल-ए-जुर्म भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 और 26 के तहत अस्वीकार्य है।

बेंच ने कहा, “परिस्थितिजन्य साक्ष्य तभी स्वीकार्य है जब वे एक अटूट श्रृंखला बनाएँ और केवल अपराध की ओर इशारा करें। इस मामले में न तो मकसद सिद्ध हुआ और न ही घटनाक्रम। इसलिए दोषसिद्धि असंभव है।”


कोर्ट का निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मामला संदेह से परे सिद्ध नहीं हुआ और मृतक का शव आरोपियों के घर से मिलने मात्र से दोषसिद्धि नहीं की जा सकती।
अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए सभी आरोपियों को बरी कर दिया।


Cause Title: Nagamma @ Nagarathna v. The State of Karnataka


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