सुप्रीम कोर्ट में 3,500 से अधिक जनहित याचिकाएं लंबित, 698 मामले 10 साल से ज्यादा पुराने। 42 साल पुरानी PIL भी अब तक लंबित, बढ़ता न्यायिक बोझ चिंता का विषय।
भारत की सर्वोच्च अदालत Supreme Court of India में जनहित याचिकाओं (PIL) का बढ़ता बोझ अब गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। संवैधानिक व्याख्या और तात्कालिक आपराधिक अपीलों जैसे अहम मामलों की सुनवाई के लिए स्थापित इस अदालत में इस समय 3,500 से अधिक PIL लंबित हैं—जो न्यायिक प्रणाली की क्षमता और प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े करती है।
कानून मंत्रालय द्वारा संसद में साझा आंकड़ों के अनुसार, 10 मार्च तक कुल 3,525 जनहित याचिकाएं लंबित हैं। इनमें से 698 मामले ऐसे हैं जो 10 वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक याचिका 42 वर्षों से लंबित है, जो भारतीय न्याय व्यवस्था में देरी की गंभीर समस्या को उजागर करती है।
पर्यावरण और भूमि विवादों का दबदबा
लंबित PIL में अधिकांश मामले पर्यावरण संरक्षण, भूमि कानूनों और कृषि पट्टेदारी (टेनेंसी) से जुड़े हैं। ये विषय स्वभावतः जटिल होते हैं और अक्सर कई सरकारी एजेंसियों, विशेषज्ञ समितियों और नीतिगत निर्णयों से जुड़े रहते हैं, जिसके चलते इनका निपटारा लंबा खिंचता है।
2025 में सबसे ज्यादा दाखिल PIL
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में 570 नई PIL दाखिल की गईं—जो पिछले वर्षों की तुलना में सबसे अधिक हैं। इसके बाद 2019 में 347, 2020 में 306 और 2026 में अब तक 293 याचिकाएं दाखिल हुई हैं। यह ट्रेंड दिखाता है कि PIL का उपयोग लगातार बढ़ रहा है, जबकि उनके निपटारे की गति अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है।
पिछले पांच वर्षों में अदालत ने 1,872 PIL का निपटारा किया है, लेकिन यह संख्या लंबित मामलों के मुकाबले काफी कम है। सुप्रीम कोर्ट में कुल लंबित मामलों की संख्या पहले ही 80,000 के पार है, और PIL का बढ़ता बोझ इस स्थिति को और जटिल बना रहा है।
42 साल पुराना मामला अब भी लंबित
सबसे पुरानी लंबित PIL वर्ष 1984 की है, जो प्रसिद्ध पर्यावरणीय मुकदमे M.C. Mehta v. Union of India से जुड़ी है। इसके अलावा 1985 से लंबित दो अन्य याचिकाएं भी इसी श्रृंखला का हिस्सा हैं। इन मामलों में पर्यावरण संरक्षण, शहरी विकास और नगर निगम कानून जैसे मुद्दे शामिल हैं।
अवमानना से जुड़े मामले भी लंबित
अदालत की अवमानना (Contempt of Court) से जुड़े दो महत्वपूर्ण PIL भी दशकों से लंबित हैं, जिनमें इकबाल अंसारी बनाम कल्याण सिंह (1995) और असलम भूरे बनाम एस.बी. चौहान (1996) शामिल हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि संवेदनशील मामलों में भी समयबद्ध निपटान नहीं हो पा रहा है।
मृत याचिकाकर्ताओं के मामले
कई मामलों में याचिकाकर्ताओं का निधन हो चुका है, लेकिन उनके मामले आज भी अदालत में लंबित हैं। ऐसे मामलों में मोहम्मद हाशिम, हराधन रॉय और ओ. फर्नांडीस जैसे उदाहरण शामिल हैं। यह स्थिति न्यायिक प्रक्रिया की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
PIL: उद्देश्य और वर्तमान चुनौती
भारत में जनहित याचिका की अवधारणा की शुरुआत P. N. Bhagwati ने की थी, जिसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को न्याय दिलाना था। समय के साथ PIL न्यायिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण उपकरण बन गई, लेकिन अब इसकी बढ़ती संख्या और लंबितता इसे एक चुनौती में बदल रही है।
आगे का रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि PIL की स्वीकृति के लिए सख्त मानदंड, फास्ट-ट्रैक बेंच और केस मैनेजमेंट सिस्टम जैसे उपाय अपनाने की आवश्यकता है। साथ ही, गैर-गंभीर या प्रचार-प्रेरित याचिकाओं पर लागत (cost) लगाने से भी स्थिति में सुधार हो सकता है।
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