IBC में ‘Commercial Wisdom’ सर्वोपरि: सुप्रीम कोर्ट ने SKS Power के रिज़ॉल्यूशन प्लान पर चुनौती खारिज की
सुप्रीम कोर्ट ने SKS Power Generation Ltd. के रिज़ॉल्यूशन प्लान को लेकर दायर अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि IBC में Committee of Creditors की ‘commercial wisdom’ सर्वोपरि है और अदालतें सीमित परिस्थितियों में ही दखल दे सकती हैं।
Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण फैसले में दोहराया कि Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 (IBC) के तहत Committee of Creditors (CoC) की “commercial wisdom” सर्वोपरि है और अदालतें इसमें सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप कर सकती हैं।
न्यायमूर्ति BV Nagarathna और न्यायमूर्ति R Mahadevan की पीठ ने SKS Power Generation Limited के रिज़ॉल्यूशन प्लान को चुनौती देने वाली अपीलों को खारिज करते हुए कहा कि IBC का ढांचा तेज़, निश्चित और ऋणदाताओं द्वारा संचालित निर्णय प्रक्रिया को प्राथमिकता देता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अदालतें CoC के व्यावसायिक निर्णयों की विस्तृत समीक्षा करने लगें तो इससे दिवाला समाधान प्रक्रिया की निश्चितता और अंतिमता दोनों प्रभावित होंगी।
मामला क्या था
यह विवाद छत्तीसगढ़ स्थित बिजली कंपनी SKS Power Generation Limited के कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) से जुड़ा था।
कंपनी के लिए प्रस्तुत रिज़ॉल्यूशन प्लान को Sarda Energy and Minerals Limited (SEML) ने प्रस्तावित किया था।
National Company Law Tribunal (NCLT) ने अक्टूबर 2024 में इस प्लान को मंजूरी दे दी थी। इसके साथ ही अन्य असफल रिज़ॉल्यूशन आवेदकों—Torrent Power Limited, Vantage और Jindal—की आपत्तियों को खारिज कर दिया गया था।
बाद में National Company Law Appellate Tribunal (NCLAT) ने भी NCLT के फैसले को बरकरार रखा। इसके खिलाफ असफल बोलीदाताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अपीलकर्ताओं की दलील
अपीलकर्ताओं का तर्क था कि SEML ने बातचीत की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद अपने रिज़ॉल्यूशन प्लान में संशोधन किया।
उनका कहना था कि सभी आवेदकों की व्यावसायिक पेशकश “फ्रीज़” हो चुकी थी, लेकिन इसके बाद SEML ने बैंक गारंटी और अग्रिम भुगतान से जुड़े पहलुओं में बदलाव कर अपने प्रस्ताव को बेहतर बना लिया।
अपीलकर्ताओं ने यह भी कहा कि भले ही CoC की “commercial wisdom” को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन यह पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से मुक्त नहीं है। यदि निर्णय मनमाना या अविवेकपूर्ण हो, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का आकलन
सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले IBC के अपीलीय ढांचे पर जोर दिया।
कोर्ट ने कहा कि Insolvency and Bankruptcy Code, 2016 के तहत NCLAT में अपील केवल पाँच विशेष आधारों पर ही की जा सकती है, जबकि सुप्रीम कोर्ट में अपील केवल कानून के प्रश्न पर ही स्वीकार्य होती है।
पीठ ने पाया कि अपीलकर्ताओं की शिकायत इन निर्धारित आधारों में फिट नहीं बैठती।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) ने इस मामले में कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं लिया था, बल्कि केवल CoC के निर्देशों का पालन किया था।
CoC ने जब रिज़ॉल्यूशन प्लानों में कुछ अस्पष्टताएँ देखीं, तो उसने RP को सभी आवेदकों से स्पष्टीकरण मांगने को कहा। RP ने सभी से समान रूप से जवाब मांगे और उन जवाबों को CoC के सामने रख दिया।
इसलिए कोर्ट ने कहा कि RP के इस व्यवहार को “material irregularity” नहीं कहा जा सकता।
क्या प्लान में संशोधन हुआ था?
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए पाया कि SEML के प्लान में शुरुआत से ही यह प्रावधान था कि लगभग ₹180.05 करोड़ की मार्जिन मनी अंततः ऋणदाताओं को मिलेगी।
इसलिए यह कहना कि कंपनी ने बाद में अपनी पेशकश बढ़ाई, तथ्यात्मक रूप से गलत है।
पीठ ने कहा कि अपीलकर्ताओं के आरोप न तो संशोधन साबित करते हैं और न ही प्रक्रिया में कोई गंभीर अनियमितता।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि दिवाला मामलों में असफल बोलीदाता अक्सर मुकदमेबाजी के जरिए दूसरी बार मौका पाने की कोशिश करते हैं।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसी रणनीतिक मुकदमेबाजी से पूरी दिवाला प्रक्रिया लंबी हो जाती है और कंपनी की आर्थिक कीमत घटती है।
पीठ ने कहा:
“जब CoC के व्यावसायिक निर्णयों को व्यापक न्यायिक समीक्षा के अधीन किया जाता है, तो समाधान प्रक्रिया की समयसीमा बढ़ती है, लागत बढ़ती है और कॉरपोरेट देनदार की वैल्यू घटती है।”
अंतिम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब रिज़ॉल्यूशन प्लान को NCLT और NCLAT दोनों मंजूरी दे चुके हैं और उसका कार्यान्वयन भी हो चुका है, तो इस चरण पर हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
इसी के साथ अदालत ने सभी अपीलें खारिज कर दीं और NCLAT के फैसले को बरकरार रखा।
Case: Torrent Power Ltd v Ashish Arjunkumar Rathi
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