Cheque Dishonour Case : सुप्रीम कोर्ट ने धारा 138 एनआई एक्ट (चेक बाउंस मामलों) में लंबित मुकदमों पर चिंता जताते हुए समन सेवा, ऑनलाइन भुगतान सुविधा और त्वरित निपटान हेतु विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए।
‘चेक बाउंस मामलों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: समन सेवा, ऑनलाइन पेमेंट व त्वरित निपटान हेतु नई गाइडलाइन्स’
सुप्रीम कोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया ने बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को पलटते हुए कहा कि देशभर की जिला अदालतों में चेक बाउंस मामलों (धारा 138, एनआई एक्ट, 1881 Sec 138 Negotiable Instruments Act 1881 ) का बैकलॉग बेहद चिंताजनक स्तर पर है।
पीठ ने कहा कि समन की सेवा में देरी और तकनीकी अड़चनें मामलों के निपटारे में सबसे बड़ी बाधा बनी हुई हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चेक बाउंस मामलों में सजा का उद्देश्य प्रतिशोध नहीं बल्कि भुगतान सुनिश्चित करना और चेक की विश्वसनीयता बनाए रखना है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख दिशानिर्देश:
- समन सेवा – पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ दस्ती सेवा व ई-मेल, मोबाइल/व्हाट्सऐप जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से भी समन भेजा जाए।
- ऑनलाइन भुगतान – जिला अदालतें सुरक्षित QR कोड/UPI लिंक से भुगतान की सुविधा उपलब्ध कराएं। आरोपी सीधे ऑनलाइन भुगतान कर सके और निपटान तुरंत हो।
- सारांश वाद – धारा 143 एनआई एक्ट के तहत मामलों का सारांश में निपटान किया जाए; लंबी सुनवाई तभी जब ठोस कारण हों।
- डैशबोर्ड मॉनिटरिंग – दिल्ली, मुंबई और कोलकाता की जिला अदालतें चेक बाउंस केस डैशबोर्ड तैयार करें, जिसमें लंबित मामलों व निपटान की मासिक रिपोर्ट हाईकोर्ट को भेजी जाए।
- ADR और लोक अदालतें – हाईकोर्ट की प्रशासनिक समितियां मध्यस्थता और लोक अदालतों को प्रोत्साहित करें ताकि शुरुआती स्तर पर ही निपटारा हो सके।
केस का नतीजा
कोर्ट ने आरोपी को आदेश दिया कि वह ₹7,50,000 की राशि 15 किस्तों (₹50000 प्रति माह) में अदा करे। साथ ही कोर्ट ने Damodar S. Prabhu बनाम सैयद बाबालाल हुसैन (2010) में दिए गए कंपाउंडिंग दिशानिर्देश को और अधिक व्यावहारिक बनाते हुए लागत/जुर्माने की प्रतिशत राशि तय की।
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