सुप्रीम कोर्ट का फैसला: नाइट्रस ऑक्साइड बिक्री मामले में हाई कोर्ट का निर्णय रद्द

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औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम की धारा 3 में ‘निर्माण’ शब्द खुदरा व्यापार के सामान्य क्रम में औषधि के वितरण और पैकिंग को बाहर रखता है: सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court on Drugs and Cosmetics Act | Drugs and Cosmetics Act 1940 | Manufacture Definition in Drugs Act

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें नाइट्रस ऑक्साइड I.P. की बिना लाइसेंस वाली फर्म को बिक्री को लेकर दायर आपराधिक शिकायत को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

ड्रग इंस्पेक्टर ने शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने नाइट्रस ऑक्साइड I.P. को एक बिना लाइसेंस वाली फर्म को बेचा, जो कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 18(ए)(vi) और 1945 नियमों के नियम 65(5)(1)(b) का उल्लंघन है, जो कि धारा 27(d) के तहत दंडनीय है।

अपीलकर्ता ने हाई कोर्ट का रुख कर आपराधिक शिकायत को निरस्त करने की मांग की, लेकिन हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में आया।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण निष्कर्ष

1. “Manufacture” की परिभाषा व्यापक

न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने धारा 3 का हवाला देते हुए कहा कि “Manufacture” शब्द की परिभाषा केवल निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें—
प्रसंस्करण (Processing)
संशोधन (Altering)
पैकेजिंग (Packing)
लेबलिंग (Labeling)
वितरण (Distribution) शामिल है।

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हालांकि, खुदरा व्यापार में दवा की पैकिंग या कम्पाउंडिंग इस परिभाषा से बाहर है।

2. अभियोजन पक्ष को साबित करना होगा लाइसेंस का उल्लंघन

अदालत ने कहा कि धारा 18 और धारा 27 के तहत अपराध साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि—
🔹 आरोपियों ने बिना वैध लाइसेंस के दवा बेची या वितरित की।
🔹 बिक्री प्राप्त करने वाले फर्म (आरोपी संख्या-3) के पास इसे आगे बेचने का लाइसेंस नहीं था।

3. नियम 65 और फार्म 25 की व्याख्या

अदालत ने स्पष्ट किया कि फॉर्म 25 के तहत जारी लाइसेंस केवल थोक बिक्री और भंडारण के लिए अनुमति देता है। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि फार्म 25 के साथ फार्म 20B लाइसेंस अनिवार्य है, लेकिन अदालत ने इसे गलत निष्कर्ष करार दिया।

4. मजिस्ट्रेट के आदेश में “माइंड अप्लिकेशन” की कमी

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि—
मजिस्ट्रेट ने अभियोजन पक्ष के तर्कों को केवल दर्ज किया, लेकिन कोई ठोस कारण नहीं दिया।
मजिस्ट्रेट ने यह जांच नहीं की कि क्या प्रस्तुत साक्ष्य पर्याप्त थे।
आरोपियों को समन जारी करना एक गंभीर प्रक्रिया है और इसे बिना उचित जांच के नहीं किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि—
मजिस्ट्रेट ने समन जारी करने से पहले तथ्यों पर विचार नहीं किया।
हाई कोर्ट ने भी कानूनी मुद्दों का सही मूल्यांकन नहीं किया।

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इसलिए, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए आपराधिक शिकायत को खारिज कर दिया।

न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता आवश्यक

इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 के तहत निर्माण (Manufacture) की परिभाषा व्यापक है और किसी कंपनी के पास लाइसेंस होने पर उसे प्रसंस्करण, लेबलिंग, वितरण का अधिकार होता है।

इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि न्यायिक आदेश बिना उचित विश्लेषण के पारित नहीं किए जाने चाहिए, अन्यथा व्यापारिक संस्थानों पर अनुचित आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जा सकते हैं।

वाद शीर्षक – आइनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स लिमिटेड बनाम आंध्र प्रदेश राज्य

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