सुप्रीम कोर्ट ने कहा—राज्य पुनर्गठन के बाद स्वतः मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव का दर्जा स्वतः समाप्त

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SC: यूपी-उत्तराखंड बंटवारे से सोसाइटी ‘मल्टी-स्टेट’ नहीं बनती, हाईकोर्ट का फैसला रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कहा—राज्य पुनर्गठन के बाद स्वतः मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव का दर्जा नहीं मिलता। बाजपुर-गदरपुर गन्ना सोसाइटी केस में हाईकोर्ट का फैसला रद्द।


राज्य पुनर्गठन और सहकारी संस्थाओं की कानूनी स्थिति पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए Supreme Court of India ने स्पष्ट किया है कि केवल राज्य के विभाजन के कारण कोई सहकारी समिति स्वतः “मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटी” नहीं बन जाती। अदालत ने बाजपुर और गदरपुर की गन्ना उत्पादक सहकारी समितियों को मल्टी-स्टेट सोसाइटी मानने से इनकार करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2007 के फैसले को रद्द कर दिया।

मामला क्या था?

यह विवाद Uttar Pradesh Reorganisation Act, 2000 और Multi-State Cooperative Societies Act, 2002 के बीच टकराव से जुड़ा था।

बाजपुर की गन्ना उत्पादक सहकारी समिति मूल रूप से U.P. Cooperative Societies Act, 1965 के तहत पंजीकृत थी और इसका संचालन उत्तर प्रदेश के कई गांवों में फैला था।

साल 2000 में उत्तर प्रदेश के विभाजन के बाद उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया, जिससे समिति का कार्यक्षेत्र अस्थायी रूप से दो राज्यों—उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड—में फैल गया।

पुनर्गठन के बाद विवाद

विभाजन के बाद दोनों राज्यों के अधिकारियों ने सहकारी समितियों के पुनर्गठन का निर्णय लिया। इसके तहत:

  • समिति ने 2001 में पुनर्गठन का प्रस्ताव पारित किया
  • उपनियमों (bye-laws) में संशोधन किया गया
  • 2002 में उत्तर प्रदेश के गांवों को समिति के कार्यक्षेत्र से हटा दिया गया

इसके बाद समिति का संचालन पूरी तरह उत्तराखंड तक सीमित हो गया।

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हालांकि, एक किसान सदस्य ने इस कार्रवाई को चुनौती दी और मामला अंततः केंद्रीय रजिस्ट्रार के समक्ष मध्यस्थता तक पहुंचा, जहां यह कहा गया कि समिति स्वतः मल्टी-स्टेट बन गई है।

हाईकोर्ट का फैसला

हाईकोर्ट ने भी यह माना कि राज्य विभाजन के बाद समिति मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटी बन गई थी और चुनाव केंद्रीय रजिस्ट्रार की निगरानी में कराने के निर्देश दिए।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

न्यायमूर्ति Pamidighantam Sri Narasimha और Alok Aradhe की पीठ ने इस निष्कर्ष से असहमति जताई।

अदालत ने कहा कि:

  • Multi-State Cooperative Societies Act, 2002 की धारा 103 में दी गई “deeming fiction” (कानूनी कल्पना) स्वतः लागू नहीं होती
  • इसे लागू करने के लिए यह देखना जरूरी है कि क्या समिति के “उद्देश्य” (objects) वास्तव में बहु-राज्यीय हैं

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “कार्य क्षेत्र” (area of operation) और “उद्देश्य” (objects) अलग-अलग अवधारणाएं हैं। केवल भौगोलिक विस्तार से कोई संस्था मल्टी-स्टेट नहीं बन जाती।

Reorganisation Act को प्राथमिकता

अदालत ने Uttar Pradesh Reorganisation Act, 2000 की धारा 87 और 93 का हवाला देते हुए कहा कि:

  • राज्य पुनर्गठन के बाद संस्थाओं के संचालन के लिए विशेष संक्रमणकालीन प्रावधान मौजूद हैं
  • इन प्रावधानों को अन्य कानूनों पर वरीयता (overriding effect) प्राप्त है

इसलिए, पुनर्गठन के तहत किए गए वैध कदमों को बाद में किसी अन्य कानून के आधार पर अमान्य नहीं किया जा सकता।

अहम टिप्पणी

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
“धारा 103 का प्रभाव न तो स्वतः लागू होता है और न ही यह पुनर्गठन अधिनियम के तहत किए गए कार्यों को पीछे से अमान्य कर सकता है।”

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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा:

  • बाजपुर और गदरपुर की समितियां मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटी नहीं हैं
  • पुनर्गठन अधिनियम के तहत किया गया पुनर्गठन वैध है
  • हाईकोर्ट का 14 मार्च 2007 का फैसला रद्द किया जाता है

अदालत ने राज्य प्राधिकरणों को निर्देश दिया कि वे सहकारी कानूनों के तहत शीघ्र चुनाव कराएं

व्यापक महत्व

यह फैसला सहकारी समितियों, विशेषकर राज्य पुनर्गठन से प्रभावित संस्थाओं के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि कानूनी कल्पना (deeming fiction) का दायरा सीमित होता है और इसे व्यापक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।


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