धर्म के नाम पर पशु बलि पर रोक की मांग: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को जारी किया नोटिस

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मुख्य फोकस पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 28

धर्म के नाम पर पशु बलि पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय पशुपालन मंत्रालय को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने 4 सप्ताह में जवाब मांगा और मामले को एक महीने बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।

सुप्रीम कोर्ट ने धर्म के नाम पर पशु बलि पर प्रतिबंध लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। न्यायालय ने केंद्रीय पशुपालन मंत्रालय को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान कहा कि केंद्र सरकार इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करे। अदालत ने आदेश में कहा, “नोटिस जारी किया जाए। चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल किया जाए।” मामले को अगली सुनवाई के लिए एक महीने बाद सूचीबद्ध किया गया है।

यह जनहित याचिका अधिवक्ता श्रुति बिष्ट ने दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में पशु बलि की प्रथा को रोकने के लिए सरकार ने पर्याप्त कदम नहीं उठाए हैं। याचिकाकर्ता ने अदालत से अनुरोध किया है कि वह इस प्रथा पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश दे।

याचिका का मुख्य फोकस पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 28 पर है। इस प्रावधान में कहा गया है कि यदि किसी धर्म के अनुसार किसी पशु की हत्या की जाती है, तो उसे अपराध नहीं माना जाएगा। याचिकाकर्ता ने इस प्रावधान में संशोधन की मांग करते हुए कहा है कि धार्मिक आधार पर पशुओं की हत्या को कानूनी छूट देना संविधान के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।

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याचिका में अदालत से यह भी आग्रह किया गया है कि धार्मिक समारोहों में बलि के लिए लाए जाने वाले पशुओं की सुरक्षा के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार किया जाए। इसके लिए संसद से कानून बनाने या मौजूदा कानून में संशोधन करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

याचिका में कहा गया है कि इतिहास में कई क्षेत्रों में पशु बलि की प्रथा समय के साथ कम हुई थी, लेकिन बाद में यह कुछ क्षेत्रों में फिर से प्रचलन में आ गई। याचिकाकर्ता के अनुसार, यह प्रथा विभिन्न स्वदेशी और स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के साथ मिलकर फिर से धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा बन गई

याचिका में दावा किया गया है कि वर्तमान में भारत के कुछ हिस्सों में धार्मिक अवसरों पर पशु बलि दी जाती है। इसमें हिमालयी क्षेत्र, उत्तर-पूर्वी भारत, ओडिशा, पश्चिम बंगाल के कुछ इलाके, महाराष्ट्र तथा दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसे आयोजनों में अक्सर युवा नर पशुओं को बलि के लिए चुना जाता है।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि पशुओं के जीवन की रक्षा करना संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है। इसमें कहा गया है कि न्यायालय पूर्व के कई फैसलों में यह मान चुका है कि प्रत्येक जीवित प्रजाति को जीवन का अधिकार है। याचिकाकर्ता के अनुसार, संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की व्यापक व्याख्या करता है और इसे केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए।

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याचिका में अदालत से व्यापक दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया गया है। इसके तहत पशु बलि जैसी प्रथाओं पर अंकुश लगाने के लिए मजबूत विधायी उपाय, जन जागरूकता अभियान और गैर-सरकारी संगठनों के साथ सहयोग जैसे कदम सुझाए गए हैं।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब मांगा है। केंद्र के जवाब और आगे की सुनवाई के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि अदालत इस संवेदनशील और विवादास्पद विषय पर आगे किस दिशा में कदम उठाती है।

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