‘कुछ जज राजा से भी ज्यादा वफादार’ – जमानत, FIR और जेल पर जस्टिस भुइयां की बड़ी टिप्पणी

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि कुछ जज ‘राजा से ज्यादा वफादार’ बनने की कोशिश में योग्य मामलों में भी जमानत नहीं देते, जिससे लोग महीनों जेल में रहते हैं। उन्होंने FIR के अंधाधुंध पंजीकरण और लंबित मामलों पर भी चिंता जताई।


‘राजा से ज्यादा वफादार’ टिप्पणी से न्यायपालिका पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने न्यायपालिका की भूमिका पर आयोजित एक सम्मेलन में न्यायिक व्यवस्था, जमानत प्रणाली और आपराधिक मामलों के बढ़ते बोझ पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के भीतर भी कुछ लोग ऐसे हैं जो “राजा से भी अधिक वफादार” बनने का रवैया अपनाते हैं और योग्य मामलों में भी जमानत देने से इनकार कर देते हैं, जिससे लोग लंबे समय तक जेल में बंद रहते हैं।

उन्होंने कहा कि यह स्थिति व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपराधिक न्याय प्रणाली दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।


मामूली मामलों में FIR दर्ज होने पर चिंता

जस्टिस भुइयां ने कहा कि हाल के वर्षों में मामूली मामलों में भी एफआईआर दर्ज करने का चलन तेजी से बढ़ा है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक प्रदर्शन, छात्र आंदोलनों, सोशल मीडिया पोस्ट और यहां तक कि मीम्स जैसे मामलों में भी आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका ने ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करने के निर्देश नहीं दिए, फिर भी पुलिस द्वारा बड़ी संख्या में मामले दर्ज किए जा रहे हैं। ऐसे मामलों में जांच चलती रहती है और अंततः कई मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं, जहां अदालत को विशेष जांच दल (SIT) तक गठित करने पड़ते हैं। इससे न्यायपालिका का बहुत समय ऐसे मामलों में खर्च होता है, जिसे अन्य महत्वपूर्ण मामलों में लगाया जा सकता था।

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लोग महीनों जेल में रहते हैं – न्यायपालिका की भी जिम्मेदारी

जस्टिस भुइयां ने यह भी स्वीकार किया कि इस स्थिति के लिए केवल जांच एजेंसियां ही नहीं बल्कि न्यायपालिका का एक हिस्सा भी जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि कुछ न्यायिक अधिकारी जांच एजेंसियों के प्रति अत्यधिक सम्मान दिखाते हैं और जमानत देने से बचते हैं, जिसके कारण लोग महीनों तक जेलों में बंद रहते हैं।

उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को आपराधिक न्याय प्रणाली का केंद्र होना चाहिए और अदालतों को जमानत के मामलों में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।


पीएमएलए और यूएपीए जैसे कानूनों के इस्तेमाल पर टिप्पणी

जस्टिस भुइयां ने पीएमएलए और यूएपीए जैसे कठोर कानूनों के इस्तेमाल पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग जैसे अपराधों से निपटने के लिए कठोर कानून जरूरी हैं, लेकिन इनका अत्यधिक इस्तेमाल उनकी प्रभावशीलता को कम कर सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि हर मामले में कठोर कानूनों का इस्तेमाल किया जाएगा, तो इन कानूनों का उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अनावश्यक असर पड़ेगा।


लंबित मामलों की बड़ी वजह – सरकार सबसे बड़ा वादी

लंबित मामलों के मुद्दे पर बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि भारत में मामलों के लंबित रहने का एक बड़ा कारण यह है कि सरकार सबसे बड़ी वादी (litigant) है। सरकारी विभाग बड़ी संख्या में मुकदमे दायर करते हैं और अपीलें करते हैं, जिससे अदालतों पर बोझ बढ़ता जाता है।

उन्होंने कहा कि भारत में एक न्यायाधीश द्वारा प्रतिदिन निपटाए जाने वाले मामलों की संख्या अभूतपूर्व है और एक न्यायाधीश के लिए एक दिन में 400 या 500 मामलों का निपटारा करना मानवीय रूप से संभव नहीं है।

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न्यायिक प्रणाली पर महत्वपूर्ण संदेश

जस्टिस भुइयां की टिप्पणियों को न्यायिक प्रणाली पर एक महत्वपूर्ण आत्ममंथन के रूप में देखा जा रहा है। उनकी टिप्पणियां जमानत कानून, एफआईआर के दुरुपयोग, कठोर कानूनों के इस्तेमाल और लंबित मामलों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को सामने लाती हैं।

उनकी टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि न्यायपालिका के भीतर भी इस बात को लेकर चिंता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, निष्पक्ष जांच और न्यायिक दक्षता के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। न्यायपालिका, जांच एजेंसियों और सरकार तीनों को मिलकर आपराधिक न्याय प्रणाली को अधिक संतुलित और प्रभावी बनाना होगा।


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