पुलिस सुरक्षा किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस सुरक्षा कोई मौलिक या वैधानिक अधिकार नहीं है। विकास चौधरी की CRPF सुरक्षा की मांग खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया—खतरे का आकलन प्रशासन का दायित्व, न कि न्यायालय का।
Allahabad High Court ने स्पष्ट किया है कि पुलिस सुरक्षा किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं है और न ही यह कोई मौलिक या वैधानिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि राज्य किसी विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग का निर्माण नहीं कर सकता और सुरक्षा की मांग करने वाले व्यक्ति को अपने जीवन पर वास्तविक, ठोस और तात्कालिक खतरे का प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।
न्यायमूर्ति Saurabh Srivastava और न्यायमूर्ति Sudhanshu Chauhan की खंडपीठ ने अलीगढ़ निवासी विकास चौधरी व एक अन्य की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
क्या थी याचिका?
याचियों ने केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के सचिव को निर्देश देने की मांग की थी कि उन्हें केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल—विशेष रूप से Central Reserve Police Force (CRPF)—की सुरक्षा प्रदान की जाए।
याचियों का दावा था कि उन्होंने तीन अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज कराई हैं—
- ईंट भट्ठे की चहारदीवारी और श्रमिक आवासों को नुकसान पहुंचाने के संबंध में,
- कथित फर्जी ट्रस्ट दस्तावेज को लेकर,
- मोबाइल फोन हैकिंग से जुड़ा मामला।
उनका कहना था कि इन घटनाओं के कारण उनकी जान को खतरा है और उन्हें केंद्रीय सुरक्षा दी जानी चाहिए।
‘वास्तविक खतरे’ का अभाव
खंडपीठ ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि याचियों के जीवन पर वास्तविक और प्रत्यक्ष खतरा है। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि दर्ज एफआईआर में किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख नहीं है जिसने याचियों या उनके परिजनों को जान से मारने की धमकी दी हो।
कोर्ट ने कहा कि केवल एफआईआर दर्ज होना अपने-आप में केंद्रीय सुरक्षा का आधार नहीं बनता। खतरे का आकलन तथ्यों और परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण पर निर्भर करता है।
पहले से उपलब्ध सुरक्षा
अदालत ने यह भी नोट किया कि 6 अगस्त 2023 के आदेश के तहत याचियों को पहले ही एक सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराया जा चुका है। सक्षम प्राधिकारी द्वारा खतरे का मूल्यांकन कर सुरक्षा प्रदान की गई है।
ऐसी स्थिति में अतिरिक्त सुरक्षा का निर्देश देना न्यायालय का कार्यक्षेत्र नहीं है। अदालत ने दोहराया कि सुरक्षा प्रदान करना कार्यपालिका का दायित्व है, न कि न्यायपालिका का।
अनुच्छेद 226 की सीमा रेखा
कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करते समय न्यायालय को यह ध्यान रखना होता है कि वह कार्यपालिका के क्षेत्राधिकार में अनावश्यक हस्तक्षेप न करे।
न्यायिक समीक्षा केवल तभी संभव है जब प्रशासनिक निर्णय मनमाना, भेदभावपूर्ण या कानून के प्रतिकूल हो। जब सक्षम प्राधिकारी ने खतरे का मूल्यांकन कर उचित सुरक्षा प्रदान कर दी है, तब अदालत अतिरिक्त सुरक्षा देने का आदेश नहीं दे सकती।
स्पष्ट संदेश
यह निर्णय बताता है कि पुलिस या केंद्रीय सुरक्षा किसी सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य सुरक्षा को ‘विशेषाधिकार’ के रूप में वितरित नहीं कर सकता।
सुरक्षा की मांग करने वाले व्यक्ति को ठोस साक्ष्यों के साथ वास्तविक खतरे को सिद्ध करना होगा—सिर्फ आशंका या सामान्य विवाद पर्याप्त आधार नहीं है।
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