सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की परिभाषा से जुड़े मामले में विशेषज्ञ समिति गठित करने के लिए अगली सुनवाई तय की है। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल सभी गतिविधियों, खासकर खनन, पर यथास्थिति बनी रहेगी।
अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और सीमांकन को लेकर चल रहे महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति गठित करने के उद्देश्य से अगली सुनवाई सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। आदेश अपलोड होने के बाद तारीख स्पष्ट की जाएगी।
CJI Surya Kant की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि फिलहाल सभी गतिविधियाँ—विशेषकर वे खनन कार्य जिनके लिए पहले लाइसेंस या अनुमति दी गई थी—रुकी हुई हैं और यह यथास्थिति तब तक बनी रहेगी जब तक मुद्दों का चरणबद्ध समाधान नहीं किया जाता।
“हम इस तथ्य से अवगत हैं कि सभी गतिविधियाँ, खासकर खनन, फिलहाल रुकी हुई हैं। इन मुद्दों के चरणबद्ध समाधान तक यह स्थिति बरकरार रखनी होगी,” कोर्ट ने कहा।
पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि मामले को “समिति के गठन और अन्य निर्धारणीय मुद्दों” के लिए सूचीबद्ध किया जाए।
‘अरावली’ की परिभाषा पर कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान CJI ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा:
“इतिहास देखें तो यह सुप्रीम कोर्ट भवन भी अरावली है। लेकिन आज उसे अरावली कहना एक गलत नामकरण (misnomer) होगा।”
यह टिप्पणी इस जटिल प्रश्न की ओर संकेत करती है कि अरावली की वैज्ञानिक और विधिक परिभाषा क्या होनी चाहिए।
पहले क्या हुआ था?
- 20 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय द्वारा दी गई अरावली की परिभाषा को स्वीकार किया था।
- 29 दिसंबर को कोर्ट ने उस स्वीकृति को “अस्थायी रूप से स्थगित” (put in abeyance) कर दिया।
- अवकाश पीठ (CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह) ने एक नई विशेषज्ञ समिति गठित करने का भी आदेश दिया था।
कोर्ट ने केंद्र सरकार और अरावली से जुड़े चार राज्यों—
- Rajasthan
- Gujarat
- Haryana
- Delhi
—को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
विवाद की जड़: 100 मीटर ऊँचाई मानदंड
विवाद का केंद्र केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित वह नई परिभाषा है, जो 100 मीटर ऊँचाई के मानदंड पर आधारित है। पर्यावरणविदों और विपक्षी दलों ने आशंका जताई कि इससे अरावली के बड़े हिस्से में “नियंत्रित खनन” की अनुमति का जोखिम बढ़ सकता है।
हालांकि, Ministry of Environment, Forest and Climate Change (MoEF&CC) ने 24 दिसंबर को राज्यों को निर्देश जारी कर अरावली क्षेत्र में किसी भी नए खनन पट्टे (mining lease) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने को कहा।
यह प्रतिबंध गुजरात से लेकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र तक फैली अरावली शृंखला की भौगोलिक अखंडता बनाए रखने और अनियमित खनन रोकने के उद्देश्य से है।
अरावली का भौगोलिक महत्व
- लंबाई: लगभग 670 किलोमीटर
- विस्तार: दिल्ली से हरियाणा, राजस्थान होते हुए गुजरात तक
- सर्वोच्च शिखर: गुरु शिखर (माउंट आबू, राजस्थान)
- अधिकतम ऊँचाई: लगभग 1,722 मीटर
- आयु: लगभग 2 अरब वर्ष (भारत की सबसे प्राचीन फोल्ड-माउंटेन बेल्ट)
अरावली न केवल भूवैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय संतुलन, भूजल पुनर्भरण और मरुस्थलीकरण रोकने में भी अहम भूमिका निभाती है।
आगे क्या?
विशेषज्ञ समिति के गठन के बाद:
- अरावली की वैज्ञानिक और विधिक परिभाषा की पुनर्समीक्षा होगी।
- सीमांकन (demarcation) और खनन गतिविधियों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए जाएंगे।
- पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन पर न्यायालय अंतिम रूप से विचार करेगा।
यह मामला न केवल पर्यावरणीय नीति बल्कि न्यायिक सक्रियता और संघीय समन्वय के दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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