मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें पति को यह जानने के लिए DNA टेस्ट कराने की अनुमति दी गई थी कि वह बच्चे का जैविक पिता है या नहीं। कोर्ट ने कहा कि जब मामला बच्चे की वैधता नहीं बल्कि पत्नी के कथित व्यभिचार से जुड़ा हो, तो DNA टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है।
पत्नी के कथित व्यभिचार के आरोप में पितृत्व जांच के लिए DNA टेस्ट वैध: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट किया है कि जब विवाद बच्चे की वैधता (legitimacy) को चुनौती देने के लिए नहीं, बल्कि पत्नी के कथित व्यभिचार को सिद्ध करने के लिए हो, तब DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) टेस्ट का आदेश दिया जा सकता है। कोर्ट ने इस आधार पर फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराया, जिसमें पति को बच्चे के पितृत्व की जांच के लिए DNA टेस्ट कराने की अनुमति दी गई थी।
यह फैसला न्यायमूर्ति विवेक जैन ने पत्नी द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
मामले में पति भारतीय सेना में कार्यरत है, जबकि पत्नी मध्यप्रदेश पुलिस में कांस्टेबल है। पति ने तलाक याचिका में आरोप लगाया कि—
- वह अपनी ड्यूटी के कारण पत्नी से तीन से छह महीने में केवल एक बार मिल पाता था।
- अक्टूबर 2015 में पत्नी ने उसे बुलाया और चार दिनों के भीतर ही गर्भवती होने की जानकारी दे दी।
- इतने कम समय में गर्भधारण का पता चलना चिकित्सकीय और व्यावहारिक रूप से असंभव है।
- जिस अवधि में बच्चा गर्भ में आया, उस समय पति-पत्नी के बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं थे।
- बच्चा अक्टूबर 2015 के आठ महीने के भीतर पैदा हुआ, जो पति के अनुसार उसके संदेह को और मजबूत करता है।
पति ने स्पष्ट किया कि वह बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारी से बचने के लिए नहीं, बल्कि पत्नी के कथित व्यभिचार को सिद्ध करने के लिए DNA टेस्ट चाहता है।
पत्नी की दलील
पत्नी की ओर से यह तर्क दिया गया कि—
- DNA टेस्ट से नाबालिग बेटी के निजता के अधिकार (Right to Privacy) का उल्लंघन होगा।
- इससे बच्चे की वैधता पर अनावश्यक संदेह उत्पन्न होगा और उसका भविष्य प्रभावित हो सकता है।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि—
- जहाँ बच्चे को नाजायज़ घोषित करने की कोई मांग नहीं है,
- और विवाद केवल पत्नी के व्यभिचार के आरोप तक सीमित है,
- वहाँ DNA टेस्ट का आदेश देना कानूनन स्वीकार्य है।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि—
- यह मामला तीसरी तलाक याचिका से संबंधित है।
- पहली तलाक याचिका पत्नी ने आपसी सहमति से तलाक के आश्वासन पर वापस ले ली थी।
- इसके बाद आपसी सहमति से तलाक का आवेदन दायर किया गया, लेकिन पत्नी दूसरे मोशन में उपस्थित नहीं हुई।
- वर्तमान तलाक याचिका वर्ष 2021 से लंबित है।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि DNA टेस्ट का आदेश उचित और न्यायसंगत है।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने:
- फैमिली कोर्ट के DNA टेस्ट कराने के आदेश को बरकरार रखा,
- पत्नी की अपील को खारिज कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि—
- यदि पत्नी DNA सैंपल देने से इनकार करती है,
- तो फैमिली कोर्ट भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(h) या अन्य प्रासंगिक प्रावधानों के तहत उसके खिलाफ प्रतिकूल अनुमान (adverse inference) लगा सकता है।
वकीलों की उपस्थिति
- पत्नी की ओर से: अधिवक्ता अनु पाठक
- पति की ओर से: अधिवक्ता शीतल तिवारी
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