छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: व्यभिचार में लिप्त तलाकशुदा पत्नी को नहीं मिलेगा भरण-पोषण

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छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय: व्यभिचार में लिप्त तलाकशुदा पत्नी को नहीं मिलेगा भरण-पोषण

मामले का संक्षेप:
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट की एकलपीठ ने Resham Lal Dewangan v. Suman Dewangan (CRR No. 1322/2024 व CRR No. 58/2025) में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि व्यभिचार (adultery) में लिप्त तलाकशुदा पत्नी को भरण-पोषण की मांग का अधिकार नहीं है, भले ही वह तलाकशुदा क्यों न हो।

मुख्य निर्णय:
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा ने पति द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें पति को पत्नी को ₹4,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने माना कि यदि तलाक व्यभिचार के आधार पर हुआ है, तो पत्नी को CrPC की धारा 125 के तहत भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार नहीं रह जाता।


🔍 पृष्ठभूमि:

  • विवाह: 2019 में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह हुआ।
  • आरोप: विवाह के कुछ समय बाद ही पति ने पत्नी के चरित्र पर संदेह जताया। पत्नी 2021 में ससुराल छोड़कर मायके चली गई।
  • कार्रवाई:
    • पत्नी ने CrPC की धारा 125 के तहत ₹20,000 मासिक भरण-पोषण की मांग की।
    • पति ने Hindu Marriage Act, 1955 के तहत व्यभिचार के आधार पर तलाक मांगा, जो 2023 में मंजूर हुआ।
    • फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹4,000 प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया, जिसे पति ने हाई कोर्ट में चुनौती दी।
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⚖️ कानूनी विश्लेषण:

  • CrPC की धारा 125(4) के अनुसार, यदि कोई पत्नी विवाह के रहते व्यभिचार में लिप्त है, तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं होती।
  • हाई कोर्ट ने यह कहा कि यदि पत्नी के विरुद्ध व्यभिचार साबित होने के आधार पर तलाक का डिक्री पारित हुआ है, तो तलाक होने के बाद भी वह उस व्यभिचार की छूट नहीं पा सकती।
  • तलाक का डिक्री, जिसमें व्यभिचार सिद्ध हुआ है, भरण-पोषण पर निर्णय लेने के लिए पर्याप्त प्रमाण है, और उसे अलग से पुनः जांचने की आवश्यकता नहीं है।
  • कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले Shanthakumari v. Thimmegowda, 2023 SCC OnLine Kar 66 का संदर्भ भी दिया।

🧾 न्यायालय की टिप्पणियां:

  • “तलाक का आदेश यदि व्यभिचार के आधार पर है, तो यह मान लेना तर्कसंगत होगा कि पत्नी व्यभिचार में लिप्त थी और इस आधार पर वह धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण पाने की अयोग्य है।”
  • “ऐसी स्थिति में फैमिली कोर्ट के आदेश को बनाए रखना न्याय और कानून के प्रतिकूल होगा।”

अंतिम आदेश:

  • पति की पुनरीक्षण याचिका (CRR No. 1322/2024) स्वीकार की गई
  • पत्नी की याचिका (CRR No. 58/2025) अस्वीकृत की गई
  • फैमिली कोर्ट द्वारा ₹4,000 प्रति माह भरण-पोषण का आदेश रद्द किया गया।

📌 न्यायिक महत्व:

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि:

  • व्यभिचार तलाक और भरण-पोषण दोनों मामलों में एक निर्णायक कारक है।
  • भरण-पोषण के अधिकार की समीक्षा तलाक के कारणों की पृष्ठभूमि में की जानी चाहिए।
  • धारा 125 CrPC का उद्देश्य परित्यक्त या असहाय पत्नियों को सहायता देना है, न कि ऐसे मामलों में जहाँ व्यभिचार स्पष्ट रूप से सिद्ध हो चुका हो।

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