SC/ST एक्ट विवाद वाले मामलों में समझौते पर कार्यवाही रद्द हो सकती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट का अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि SC/ST एक्ट का मामला जातिगत आधार पर नहीं है और विवाद निजी प्रकृति का है, तो पक्षकारों के स्वैच्छिक समझौते पर कार्यवाही रद्द की जा सकती है। कोर्ट ने पुलिस चार्जशीट और समन आदेश रद्द किए, लेकिन शिकायतकर्ता को एक सप्ताह के भीतर सरकारी मुआवजा वापस करने का निर्देश दिया।
SC/ST एक्ट: निजी विवाद में समझौते पर केस रद्द—इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिखाई राह, शिकायतकर्ता को मुआवजा लौटाने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को स्पष्ट करते हुए कहा है कि यदि अनुसूचित जाति/जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज मामला निजी प्रकृति का हो और अपराध जातिगत आधार पर न किया गया हो, तो पक्षकारों के स्वैच्छिक समझौते पर उसे रद्द (quash) किया जा सकता है।
यह महत्वपूर्ण निर्णय न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव की एकल पीठ ने राहुल गुप्ता व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य केस में दिया।
🔹 मामले की पृष्ठभूमि
मेरेट के ब्रह्मपुरी थाने में केस क्राइम नंबर 0126/2024 के तहत अपीलकर्ताओं पर ये धाराएँ लगाई गई थीं—
- IPC 147 – दंगा
- IPC 323 – मारपीट
- IPC 500 – मानहानि
- IPC 504, 506 – गाली-गलौज व धमकी
- SC/ST एक्ट की धारा 3(2)(va)
अपीलकर्ताओं ने चार्जशीट (30 अप्रैल 2024) और समन आदेश (19 जुलाई 2024) को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
🔹 दोनों पक्षों ने आपसी समझौता किया
अपीलकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि विवाद अब समाप्त हो चुका है और दोनों पक्षों ने स्वैच्छिक समझौता कर लिया है।
हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार, विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट), मेरठ ने 4 दिसंबर 2024 को समझौते का सत्यापन भी कर दिया था।
लेकिन—
जिलाधिकारी की रिपोर्ट में सामने आया कि शिकायतकर्ता ने सरकार से मिला मुआवजा अब तक वापस नहीं किया था।
🔹 कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
हाईकोर्ट ने कहा कि:
- पूरा विवाद निजी प्रकृति का है,
- अपराध जातिगत आधार पर नहीं किया गया,
- और समझौता पूरी तरह स्वैच्छिक है।
कोर्ट ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णय का हवाला दिया:
रामअवतार बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) 13 SCC 635
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि—
“यदि विवाद दीवानी या निजी प्रकृति का है, तो SC/ST एक्ट के तहत भी समझौते पर केस रद्द किया जा सकता है, बशर्ते कि जाति-आधारित अपराध न हो।”
साथ ही हाईकोर्ट ने गुलाम रसूल खान बनाम यूपी राज्य (2022) के फुल बेंच फैसले को भी उद्धृत किया, जिसमें कहा गया था कि SC/ST एक्ट के मामलों में धारा 14-A(1) के तहत अपील से भी समझौते का लाभ मिल सकता है।
🔹 हाईकोर्ट का फैसला
चूंकि—
- समझौता सत्यापित था,
- शिकायतकर्ता ने बिना दबाव के समझौता किया,
- और मामला निजी विवाद का था,
इसलिए कोर्ट ने:
✔️ चार्जशीट और समन आदेश रद्द कर दिए
✔️ सत्र परीक्षण संख्या 892/2024 की संपूर्ण कार्यवाही समाप्त कर दी
लेकिन राहत देते समय कोर्ट ने एक सख्त शर्त लगाई:
शिकायतकर्ता को निर्देश:
“सरकार से प्राप्त मुआवजा राशि आज से एक सप्ताह के भीतर वापस की जाए।”
निष्कर्ष
यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि हर SC/ST एक्ट का मामला गैर-समझौतायोग्य नहीं है।
यदि अपराध जातिगत आधार पर नहीं किया गया हो और विवाद निजी/व्यक्तिगत हो, तो न्यायालय समझौते के आधार पर कार्यवाही निरस्त कर सकता है।
साथ ही कोर्ट ने आरोप लगाया कि सरकारी मुआवजा लिए रहने के बाद समझौता करना अनुचित लाभ है, इसलिए उसकी वापसी अनिवार्य की गई।
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