बार एसोसिएशन ‘राज्य’ नहीं, निजी संस्था है; अनुच्छेद 226 के तहत मैंडमस जारी नहीं हो सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

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दिल्ली हाईकोर्ट ने संगीता राय बनाम नई दिल्ली बार एसोसिएशन मामले में स्पष्ट किया कि बार एसोसिएशन एक निजी संस्था है और संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं मानी जा सकती। इसलिए अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उसके विरुद्ध मैंडमस की रिट जारी नहीं की जा सकती। पटियाला हाउस कोर्ट चैंबर विवाद में अपील खारिज।


बार एसोसिएशन ‘राज्य’ नहीं, निजी संस्था है; अनुच्छेद 226 के तहत मैंडमस जारी नहीं हो सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में यह स्पष्ट किया है कि बार एसोसिएशन एक प्राइवेट बॉडी है और उसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत ‘राज्य’ या ‘राज्य की संस्था’ नहीं माना जा सकता। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट अनुच्छेद 226 के तहत अपनी रिट शक्तियों का प्रयोग करते हुए बार एसोसिएशन के विरुद्ध मैंडमस की रिट जारी नहीं कर सकता।

यह फैसला मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की खंडपीठ ने संगीता राय बनाम नई दिल्ली बार एसोसिएशन मामले में पारित किया।


मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता अधिवक्ता संगीता राय ने अपनी रिट याचिका में कहा था कि वर्ष 2013 में असगर अली नामक व्यक्ति ने उनसे संपर्क कर स्वयं को पटियाला हाउस कोर्ट परिसर स्थित चैंबर संख्या 279A का अलॉटी बताया और उक्त चैंबर को किराये पर उपयोग करने का अनुरोध किया। राय ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर मासिक किराये पर उस चैंबर से अपनी वकालत प्रारंभ कर दी।

राय का आरोप था कि एक दिन जब वह तिस हजारी कोर्ट से लौटकर पटियाला हाउस कोर्ट स्थित चैंबर पहुंचीं, तो उन्होंने पाया कि असगर अली सहित लगभग दस अन्य लोगों ने ताला तोड़कर चैंबर पर कब्जा कर लिया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इन व्यक्तियों ने उन्हें धमकाया, गाली-गलौज की और बिना किसी कारण उनके सामान हटाकर चैंबर खाली करने का दबाव बनाया, साथ ही उनकी फाइलों तक पहुंच भी रोक दी गई।

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इसके बाद राय ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर:

  • चैंबर पर कब्जे की बहाली, और
  • दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।

सिंगल जज का आदेश

हाईकोर्ट के सिंगल जज ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि:

  • नई दिल्ली बार एसोसिएशन एक निजी संस्था है,
  • और वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट क्षेत्राधिकार के दायरे में नहीं आती।

इस आदेश को संगीता राय ने डिवीजन बेंच के समक्ष चुनौती दी।


डिवीजन बेंच की टिप्पणियां

खंडपीठ ने सिंगल जज के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा:

“बार एसोसिएशन निजी व्यक्तियों—अधिवक्ताओं—का एक समूह है। अपने सामान्य कार्यों के निर्वहन में वह किसी भी प्रकार का ऐसा सार्वजनिक कार्य नहीं करता जिसे ‘पब्लिक फंक्शन’ कहा जा सके। यद्यपि यह संस्था सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत पंजीकृत है, लेकिन इसके कार्यकलाप इसके मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन, संविधान और नियमों द्वारा संचालित होते हैं।”

कोर्ट ने आगे कहा कि:

“बार एसोसिएशन का मुख्य कार्य व्यक्तिगत वकीलों के हितों की रक्षा करना है। यह पूरी तरह से एक निजी संस्था है और इसे किसी भी स्थिति में ‘राज्य’ या उसकी एजेंसी, इंस्ट्रूमेंटैलिटी अथवा अथॉरिटी नहीं कहा जा सकता।”


वैकल्पिक उपायों पर कोर्ट की राय

खंडपीठ ने यह भी कहा कि:

  • राय को हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल करने के बजाय बार काउंसिल से संपर्क करना चाहिए था।
  • यदि चैंबर में जबरन प्रवेश किया गया है, तो वह संबंधित वकीलों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही भी शुरू कर सकती हैं।
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अंतिम निर्णय

डिवीजन बेंच ने:

  • सिंगल जज के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा, और
  • सिंगल जज के आदेश के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया।

वकीलों की उपस्थिति

  • संगीता राय की ओर से:
    शिशिर पिनाकी, राकेश सिंह और शवनम सिंह
  • नई दिल्ली बार एसोसिएशन की ओर से:
    आशीष गर्ग और गोविंद सिंह

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