धारा 304A में हर मामले में जेल जरूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने 3 महीने की सजा को 3 लाख रुपये मुआवज़े में बदला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 304A (BNS की धारा 106) के तहत हर मामले में जेल अनिवार्य नहीं। 13 वर्षीय बालक की सड़क दुर्घटना में मौत के मामले में आरोपी को 3 महीने की सजा के बजाय 3 लाख रुपये मुआवज़ा देने का निर्देश।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304A — जो लापरवाही या उतावलेपन से मृत्यु कारित करने से संबंधित है और अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106 के समकक्ष है — के तहत प्रत्येक मामले में कारावास की सजा देना अनिवार्य नहीं है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ 13 वर्षीय बालक की सड़क दुर्घटना में मौत से जुड़े मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
हाईकोर्ट ने बरकरार रखी थी दोषसिद्धि
मामला Abdul Sattar v. State of Karnataka शीर्षक से संबंधित है।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 5 अक्टूबर 2023 के फैसले में आरोपी अब्दुल सत्तार की दोषसिद्धि को IPC की धाराओं 279 (BNS धारा 281), 337 (BNS धारा 125(a)), 338 (BNS धारा 125(b)) और 304A के तहत बरकरार रखा था।
हालांकि हाईकोर्ट ने धारा 304A के तहत सजा को छह महीने से घटाकर तीन महीने कर दिया था और जुर्माना 5,000 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2024 को विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी थी।
पुनर्विचार में मुआवज़े का प्रस्ताव
पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने मृतक बालक के परिवार को मुआवज़ा देने की पेशकश की। सुप्रीम कोर्ट ने इस सीमित बिंदु पर नोटिस जारी किया और बाद में पुनर्विचार याचिका स्वीकार करते हुए SLP को मूल संख्या पर बहाल किया।
सुनवाई के बाद पीठ ने माना कि 13 वर्षीय बालक की मृत्यु अपीलकर्ता की लापरवाही से हुई थी। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 304A के तहत हर मामले में कारावास देना अनिवार्य नहीं है।
अनुच्छेद 142 के तहत विशेष आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए तीन महीने की सजा को मुआवज़े में परिवर्तित कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि आरोपी कुल 3 लाख रुपये का भुगतान करे, जिसे मृतक बालक के माता-पिता को मुआवज़े के रूप में दिया जाएगा।
पीठ ने वर्चुअल माध्यम से मैसूर शहर के देवराजा ट्रैफिक पुलिस स्टेशन में उपस्थित बालक के माता-पिता से बातचीत भी की। अदालत ने रिकॉर्ड किया कि वे कठिन परिस्थितियों में हैं और अपने जीवन-निर्वाह के लिए मुआवज़ा स्वीकार करने को तैयार हैं।
भुगतान की समय-सीमा
- 2 लाख रुपये एक माह के भीतर माता-पिता के खाते में जमा किए जाएं।
- शेष 1 लाख रुपये 6 अप्रैल 2026 तक अदा किए जाएं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि आरोपी निर्धारित समय में राशि जमा करने में विफल रहता है, तो उसे हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित तीन महीने की सजा भुगतनी होगी।
इस फैसले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत दिया है कि लापरवाही से मृत्यु के मामलों में सजा निर्धारण करते समय परिस्थितियों, पीड़ित परिवार की स्थिति और न्यायोचित संतुलन को ध्यान में रखा जा सकता है।
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