एक ही लेनदेन से जुड़े कई चेक बाउंस पर अलग-अलग शिकायतें वैध: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक ही लेनदेन से जुड़े कई चेकों के अनादरण पर एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत अलग-अलग आपराधिक शिकायतें दायर की जा सकती हैं और मात्र बहुलता को कार्यवाही का दुरुपयोग नहीं माना जा सकता।

एक ही लेनदेन से जुड़े कई चेक बाउंस पर अलग-अलग शिकायतें वैध: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण स्पष्टता देते हुए कहा है कि एक ही लेनदेन के तहत जारी किए गए कई चेकों के अनादरण की स्थिति में धारा 138, नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत अलग-अलग आपराधिक शिकायतें दायर करना अपने-आप में प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं है। अदालत ने दो टूक कहा कि प्रत्येक चेक का अनादरण एक स्वतंत्र और पृथक कारण-ए-कार्यवाही (distinct cause of action) उत्पन्न करता है, बशर्ते वैधानिक शर्तें पूरी हों।

यह फैसला न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने Sumit Bansal v. MGI Developers & Promoters मामले में दिया।


मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता ने गाजियाबाद की एक परियोजना में तीन कमर्शियल यूनिट्स के लिए प्रतिवादी डेवलपर के साथ Agreement to Sell किया था और कुल मिलाकर लगभग ₹1.72 करोड़ का भुगतान किया था। निर्धारित समय के भीतर बिक्री विलेख निष्पादित और पंजीकृत न किए जाने पर, प्रतिवादी ने रिफंड और मुआवज़े के तौर पर कई चेक जारी किए—कुछ फर्म के खाते से और कुछ व्यक्तिगत रूप से प्रोपराइटर द्वारा।

प्रस्तुति पर सभी चेक अनादरित हो गए। इसके बाद अपीलकर्ता ने प्रत्येक चेक के लिए धारा 138 एनआई एक्ट के तहत अलग-अलग शिकायतें दायर कीं।

प्रतिवादियों ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर कार्यवाही रद्द करने की मांग की। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए एक शिकायत रद्द कर दी कि एक ही लेनदेन से उत्पन्न कई मुकदमे समानांतर कार्यवाही हैं, जबकि अन्य शिकायतें कायम रहीं। इसी एक शिकायत के रद्द होने को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।

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सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य प्रश्न

  1. क्या एक ही लेनदेन से जुड़े कई चेकों के अनादरण पर कई शिकायतें दायर की जा सकती हैं?
  2. क्या हाईकोर्ट ने धारा 482 CrPC के तहत प्रारंभिक स्तर पर विवादित तथ्यों की जांच कर शिकायत रद्द कर दी?

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:

“धारा 138 एनआई एक्ट के तहत, प्रत्येक चेक के अनादरण पर—यदि प्रस्तुति, अनादरण, विधिक नोटिस और भुगतान में विफलता की वैधानिक श्रृंखला पूर्ण हो—एक अलग कारण-ए-कार्यवाही उत्पन्न होता है। केवल इसलिए कि सभी चेक एक ही लेनदेन से जुड़े हैं, वे एक ही कारण-ए-कार्यवाही में विलीन नहीं हो जाते।”

हाईकोर्ट की सीमा से परे गया हस्तक्षेप

पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने थ्रेशहोल्ड पर तथ्यात्मक विवादों में प्रवेश कर अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया। यह प्रश्न कि:

  • फर्म के चेक व्यक्तिगत चेकों के स्थानापन्न थे या नहीं,
  • क्या दोनों को वैकल्पिक सुरक्षा के रूप में माना गया था,
  • क्या दोनों एक साथ प्रवर्तनीय (simultaneously enforceable) थे—

ये सभी मिश्रित तथ्यात्मक प्रश्न हैं, जिनका निर्णय ट्रायल में साक्ष्य के आधार पर होना चाहिए, न कि धारा 482 CrPC के तहत।

धारा 139 का वैधानिक अनुमान

अदालत ने धारा 139 एनआई एक्ट के तहत शिकायतकर्ता के पक्ष में चलने वाले वैधानिक अनुमान पर ज़ोर दिया:

“एक बार यह दिखा दिया जाए कि चेक विधिक देनदारी के निर्वहन में जारी हुआ और वह अनादरित हुआ, तो शिकायतकर्ता के पक्ष में देनदारी का अनुमान उत्पन्न होता है। इस अनुमान को rebut करना अभियुक्त का दायित्व है और यह परीक्षण ट्रायल में होना चाहिए।”

अदालत ने चेताया कि ट्रायल से पहले ही कार्यवाही को कुचलना (stifle) उचित नहीं है, खासकर तब जब कानून स्वयं शिकायतकर्ता के पक्ष में अनुमान प्रदान करता है।

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निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 138 एनआई एक्ट के तहत शिकायतों की बहुलता मात्र से प्रक्रिया का दुरुपयोग सिद्ध नहीं होता। जहां चेक अनादरित हों, वैधानिक नोटिस दिए गए हों और समन जारी हो चुका हो, वहां शिकायत prima facie कायम रहती है। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट द्वारा एक शिकायत को रद्द करना अनुचित ठहराया गया।


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