⚖️ Supreme Court of India करेगा अहम फैसला: क्या लिव-इन रिश्ते में रह रहे व्यक्ति पर 498A/BNS 85 के तहत मुकदमा चलेगा?
“क्या कोई व्यक्ति, जो किसी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप या शादी जैसे रिश्ते में है, उस पर आईपीसी की धारा 498ए या भारतीय न्याय संहिता, 2023 के समकक्ष प्रावधान (धारा 85) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है?”
सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप या विवाह जैसी प्रकृति के रिश्ते में रह रहे व्यक्ति पर आईपीसी की धारा 498ए (अब BNS की धारा 85) के तहत उत्पीड़न का मुकदमा चलाया जा सकता है।
कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई 9 मार्च 2026 को।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम संवैधानिक-कानूनी प्रश्न पर विचार करने की सहमति दी है—क्या किसी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप या विवाह की प्रकृति वाले रिश्ते में रहने वाले व्यक्ति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है?
यह प्रश्न कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली अपील में उठा है, जिसमें हाईकोर्ट ने ऐसे रिश्ते में रह रहे युवक के खिलाफ 498ए के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी।
👩⚖️ पीठ की टिप्पणी: “महत्वपूर्ण कानूनी सवाल”
जस्टिस Sanjay Karol और जस्टिस N. Kotiswar Singh की पीठ ने कहा:
“यह याचिका एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाती है, जिस पर विस्तार से विचार करना आवश्यक है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि यह तय करना होगा कि—
“क्या कोई व्यक्ति, जो किसी महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप या शादी जैसे रिश्ते में है, उस पर आईपीसी की धारा 498ए या भारतीय न्याय संहिता, 2023 के समकक्ष प्रावधान (धारा 85) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है?”
⏸️ ट्रायल पर रोक, केंद्र को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने:
- अपीलकर्ता युवक और उसके परिवार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी।
- केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय को पक्षकार बनाया।
- अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल Aishwarya Bhati से केंद्र की ओर से अदालत की सहायता करने को कहा।
- वरिष्ठ अधिवक्ता Neena R Nariman को न्याय मित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया और लिखित सुझाव मांगे।
- कर्नाटक सरकार, संबंधित थाना प्रभारी और शिकायतकर्ता महिला को नोटिस जारी किया।
- अगली सुनवाई 9 मार्च 2026 तय की।
📌 कानूनी पृष्ठभूमि: धारा 498A और बीएनएस की धारा 85
- आईपीसी की धारा 498ए: पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा विवाहित महिला के साथ क्रूरता/उत्पीड़न को दंडनीय बनाती है।
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS): इसमें समान प्रावधान धारा 85 में निहित है।
मुख्य विवाद यह है कि क्या “पति” शब्द की व्याख्या केवल वैध विवाह तक सीमित रहेगी, या विवाह-सदृश/लिव-इन संबंध भी इसके दायरे में आएंगे।
🏛️ हाईकोर्ट का दृष्टिकोण: ‘पति’ की संकीर्ण व्याख्या नहीं
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था:
- 498ए में प्रयुक्त “पति” शब्द की तकनीकी या संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती।
- यदि संबंध विवाह की प्रकृति का है, तो महिला को संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता।
- भले ही विवाह शून्य/अवैध हो या पक्षकार लिव-इन में रह रहे हों, कानून का उद्देश्य महिलाओं को क्रूरता से बचाना है।
हाईकोर्ट ने युवक की यह दलील खारिज कर दी थी कि चूंकि विवाह “शून्य” था (और वह पहले से विवाहित था), इसलिए 498ए लागू नहीं हो सकती।
📂 आरोप क्या हैं?
शिकायतकर्ता महिला का आरोप है कि:
- वह युवक के साथ शादी-जैसे रिश्ते में रह रही थी।
- युवक और उसके परिवार ने दहेज के लिए उत्पीड़न किया।
- उसे जलाने का प्रयास किया गया।
- युवक पहले से विवाहित था।
🔎 अब सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य प्रश्न
- क्या 498ए/बीएनएस 85 केवल वैध विवाह तक सीमित है?
- क्या “विवाह की प्रकृति वाले संबंध” को आपराधिक कानून में मान्यता मिल सकती है?
- क्या दहेज और क्रूरता के मामलों में संरक्षण का दायरा विस्तृत होना चाहिए?
यह फैसला न केवल 498ए की व्याख्या को स्पष्ट करेगा, बल्कि लिव-इन संबंधों की आपराधिक कानून में स्थिति पर भी दूरगामी प्रभाव डालेगा।
🗓️ अगली सुनवाई: 9 मार्च 2026
सभी पक्षों के जवाब और न्याय मित्र की सहायता के बाद सुप्रीम कोर्ट इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विस्तृत सुनवाई करेगा।
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