सुप्रीम कोर्ट में गरमागरम बहस: वकील को न्यायिक अवमानना की चेतावनी, बार एसोसिएशन ने उठाए सवाल

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सुप्रीम कोर्ट में गरमागरम बहस: वकील को न्यायिक अवमानना की चेतावनी, बार एसोसिएशन ने उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट के एक कोर्टरूम में उस समय अप्रत्याशित रूप से कड़ी बहस और सख्त टिप्पणियां देखने को मिलीं, जब जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने एक वकील को अदालत की अवमानना की चेतावनी दी। कोर्ट ने वकील पर न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग और न्यायालय को गुमराह करने का गंभीर आरोप लगाया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 2011 के एक आपराधिक प्रकरण से जुड़ा था, जिसमें याचिकाकर्ता को तीन वर्ष की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट द्वारा अपील खारिज किए जाने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। अप्रैल 2024 में, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि याचिकाकर्ता को दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करना होगा

हालांकि, आदेश का पालन करने के बजाय, याचिकाकर्ता के वकील ने फिर से एक नई विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर दी। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि “यह देश की सर्वोच्च अदालत है, इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। न्यायिक कार्यवाही को लापरवाही से लेना अस्वीकार्य है।”

कोर्ट में गरमागरम बहस, SCBA का विरोध

कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के प्रतिनिधि और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने इस पर आपत्ति जताई

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SCBA की उपाध्यक्ष, वरिष्ठ अधिवक्ता रचना श्रीवास्तव ने अदालत से अनुरोध किया कि आदेश जारी करने से पहले वकील को लिखित रूप में स्पष्टीकरण देने का अवसर दिया जाए। SCBA के सचिव विक्रांत यादव ने भी अदालत के आदेश पर सवाल उठाते हुए कहा, “यह आदेश पहले से लिखा हुआ प्रतीत होता है। यह हमें पूरी तरह अस्वीकार्य है।”

जजों की नाराजगी और आदेश में संशोधन

बार एसोसिएशन के विरोध और कोर्टरूम में बढ़ते तनाव के बीच, न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा,
“सिर्फ इस देश की सर्वोच्च अदालत में ही ऐसा होता है कि जब कोई आदेश सुनाया जाता है, तो उसका विरोध किया जाता है।”

हालांकि, बार एसोसिएशन के हस्तक्षेप के बाद, अदालत ने अपने आदेश में संशोधन किया और वकील को अपना स्पष्टीकरण देने का अवसर प्रदान किया

अंतिम आदेश में यह दर्ज किया गया कि SCBA और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAoRA) के अनुरोध पर, याचिकाकर्ता और उनके वकील को यह स्पष्ट करने का अवसर दिया जाएगा कि नई याचिका किन परिस्थितियों में दायर की गई थी

न्यायिक आदेशों की अवहेलना और सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना और कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग गंभीर मुद्दे हैं
खंडपीठ ने यह भी कहा कि “न्यायिक आदेशों का पालन करना सभी वकीलों की नैतिक और विधिक जिम्मेदारी है, अन्यथा यह न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप माना जाएगा।”

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निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट में इस अप्रत्याशित घटना ने न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता और कोर्ट की गरिमा पर गहन बहस छेड़ दी है। यह मामला वकीलों की जवाबदेही, न्यायिक अवमानना और सर्वोच्च न्यायालय की सख्त रुख अपनाने की नीति को रेखांकित करता है।

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