An unprecedented debate erupted in the SC over the removal of an Allahabad HC judge from criminal cases, CJI engaged in damage control
“सुप्रीम कोर्ट के भीतर टकराव: न्यायिक अधिकारों की सीमा पर गहराया विवाद”
✍️ विधि संवाददाता | 7 अगस्त 2025, नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों आंतरिक न्यायिक मर्यादा और संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर एक अभूतपूर्व बहस छिड़ गई है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ द्वारा पारित आदेश, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश को आपराधिक मामलों से हटाने का निर्देश दिया गया, ने सर्वोच्च न्यायालय के भीतर ही संवैधानिक सीमाओं और अधिकारों के अतिक्रमण को लेकर गंभीर असहजता पैदा कर दी है।
🔍 क्या है मामला?
सुनवाई के दौरान पीठ ने बेहद तीखी भाषा में टिप्पणी की:
“संबंधित जज ने खुद को शर्मसार किया है और न्याय को नुकसान पहुंचाया है।”
साथ ही, पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को निर्देश दिया कि संबंधित जज को आपराधिक मामलों से तुरंत हटाया जाए और उन्हें किसी वरिष्ठ न्यायाधीश के साथ डिवीजन बेंच में बैठाया जाए।
⚖️ ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ सिद्धांत की अनदेखी?
इस आदेश पर कई वरिष्ठ न्यायाधीशों और कानूनी विशेषज्ञों ने आपत्ति जताई है। सुप्रीम कोर्ट का स्थायी और स्पष्ट रुख यह रहा है कि किसी भी उच्च न्यायालय में ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ ‘Master of the Rooster’ वही होता है, जो उसका मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) होता है।
मुख्य न्यायाधीश ही तय करते हैं कि कौन-सा न्यायाधीश किस प्रकार के मामले सुनेगा। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट की किसी पीठ द्वारा सीधे तौर पर हाईकोर्ट के जज को कार्य से हटाने का निर्देश देना, संविधान के अनुच्छेद 50 (न्यायपालिका की स्वतंत्रता) और न्यायिक अनुशासन के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है।
⚠️ न्यायिक सिद्धांतों और प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन?
- संबंधित न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का अवसर नहीं दिया गया।
- उनके खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी की गई और तुरंत प्रभाव से सजा दी गई।
- यह सब नैसर्गिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धांतों का उल्लंघन माना जा रहा है।
पूर्व न्यायाधीशों ने कहा:
“एक न्यायिक आदेश में त्रुटि होना आम बात है, जिसे अपील में सुधारा जा सकता है। परंतु, किसी न्यायाधीश को इस प्रकार सार्वजनिक रूप से फटकारना और कार्यक्षेत्र से हटाना, न्यायिक गरिमा के अनुकूल नहीं है।”
🧩 CJI गवई की पहल: समाधान की ओर कदम
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने इस असहज स्थिति को संवैधानिक मर्यादा के भीतर सुलझाने के लिए वरिष्ठ सहयोगियों से परामर्श शुरू कर दिया है। सूत्रों के अनुसार:
- सुप्रीम कोर्ट स्वयं स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर इस आदेश की समीक्षा कर सकता है।
- इस आदेश को न्यायिक अनुशासन, कार्य क्षेत्र की सीमा, और संविधान के अनुरूप न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर निरस्त किया जा सकता है।
- भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से बचाव के लिए नई आंतरिक प्रक्रियाओं या दिशानिर्देशों पर विचार चल रहा है।
🏛️ हाल की पृष्ठभूमि: यही पीठ, राष्ट्रपति की शक्तियों पर भी टिप्पणी कर चुकी है
गौरतलब है कि यही पीठ हाल ही में राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर अनुमोदन देने के लिए समयसीमा तय करने का निर्देश दे चुकी है।
उस मामले में भी राष्ट्रपति कार्यालय ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्टीकरण और सलाह मांगी है कि क्या अनुच्छेद 142 के तहत न्यायालय को ऐसा निर्देश देने का अधिकार है।
📌 निष्कर्ष
यह पूरा घटनाक्रम एक गंभीर संवैधानिक संकट की ओर संकेत करता है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और आत्म-नियमन के मौलिक सिद्धांत पर अंतर-पीठीय टकराव न्यायिक व्यवस्था की साख को प्रभावित कर सकता है।
मुख्य न्यायाधीश की पहल, न्यायिक संतुलन और मर्यादा को पुनः स्थापित करने में निर्णायक साबित हो सकती है।
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