सुप्रीम कोर्ट की नसीहत: ‘बार-बेंच’ संबंध न टूटे, यतिन ओझा अवमानना मामले में माफ़ी ही पर्याप्त सज़ा

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Supreme Court’s advice: Bar-bench relations should not be broken, apology is sufficient punishment in Yatin Ojha contempt case

📰 सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: “जीवन में पछतावा ही सबसे बड़ी सज़ा है” — यतिन ओझा अवमानना मामला

🧾विधि संवाददाता

सुप्रीम कोर्ट ने आज गुजरात हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष यतिन ओझा द्वारा दायर उस अपील पर सुनवाई करते हुए मौखिक रूप से टिप्पणी की कि “बार और बेंच के बीच रिश्ते लंबे समय तक टूटे नहीं रह सकते।” यह मामला ओझा के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही Contempt Proceeding से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय की रजिस्ट्री पर भ्रष्टाचार के आरोप सोशल मीडिया Social Media पर लगाए थे।


⚖️ कोर्ट की टिप्पणी:

न्यायमूर्ति जे.के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय विश्नोई की पीठ ने सुझाव दिया कि:

“ओझा एक हलफनामा दाखिल करें जिसमें पछतावा और माफ़ी दर्ज हो।”

और आगे कहा:

“जीवन में पछतावा सबसे बड़ी सज़ा है। अगर कोई व्यक्ति आगे बढ़कर माफ़ी मांगता है और दोहराव की संभावना नहीं है, तो और क्या चाहिए?”


🧑‍⚖️ वकीलों की दलीलें:

सीनियर एडवोकेट के.के. वेणुगोपाल, जो वकीलों के संगठन की ओर से पेश हुए, ने कहा:

  • “ओझा ने पांच बार माफ़ी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट ने सहानुभूति दिखाई थी और मामले को हाईकोर्ट भेजा, लेकिन हाईकोर्ट ने यह कहते हुए माफ़ी अस्वीकार कर दी कि सुप्रीम कोर्ट के कहने पर माफ़ी वास्तविक नहीं हो सकती।”
  • “यह मामला COVID काल के दौरान का है, जब युवा वकीलों को सुनवाई का मौका नहीं मिल रहा था। ओझा ने उनके पक्ष में आवाज़ उठाई थी। उन्होंने अपनी कठोर भाषा के लिए माफ़ी मांगी है।”
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गुजरात बार एसोसिएशन की ओर से कहा गया कि ओझा उस समय एसोसिएशन के अध्यक्ष थे और उन्होंने बार की समस्याओं को उठाने के लिए बयान दिया था। उन्होंने बाद में माना कि भाषा कठोर थी और COVID के हालात में वे भावनात्मक रूप से बह गए थे।


🏛️ वरिष्ठ अधिवक्ता का दर्जा और विवाद:

न्यायमूर्ति महेश्वरी ने पूछा, “क्या उनका वरिष्ठ अधिवक्ता का गाउन अब भी जारी है?”
जिस पर हाईकोर्ट के वकील ने बताया कि:

  • “हां, गाउन जारी है, लेकिन अप्रैल 2024 की एक घटना के कारण हाईकोर्ट की स्थायी समिति ने उनका वरिष्ठ दर्जा वापस लेने की सिफारिश की है।”

न्यायमूर्ति महेश्वरी ने उत्तर दिया:

“कोई भी व्यक्ति अगर सामने आकर माफ़ी मांगे और दोहराव का आश्वासन दे, तो अदालत को उदारता दिखानी चाहिए।”


📝 आदेश और आगे की प्रक्रिया:

कोर्ट ने आदेश में रिकॉर्ड किया कि ओझा को एक हलफनामा दाखिल करना होगा, जिसमें वे पछतावे और भविष्य में दोहराव न होने का वचन देंगे।
पीठ ने स्पष्ट किया:

मामले का निस्तारण किया जाना चाहिए। संबंधों को ठीक करना न्याय का एक रूप है, विशेषकर बार और बेंच के बीच।”


📂 केस पृष्ठभूमि:

  • गुजरात उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 215 Article 215 के तहत स्वतः संज्ञान Sue Moto लेते हुए ओझा के बयानों पर अवमानना कार्यवाही शुरू की थी।
  • 2021 में हाईकोर्ट ने ओझा का वरिष्ठ अधिवक्ता दर्जा दो वर्षों के लिए अस्थायी रूप से बहाल किया था।
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⚖️ वाद शीर्षक:

Yatin Narendra Oza V. Suo Motu, High Court of Gujarat & Anr. (Crl.A. No. 669/2020 II-E)

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