किशोरों के आपसी सहमति वाले संबंधों को अपराध ठहराना नहीं है POCSO कानून का उद्देश्य — इलाहाबाद हाईकोर्ट

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⚖️ “किशोरों के आपसी सहमति वाले संबंधों को अपराध ठहराना नहीं है POCSO कानून का उद्देश्य” — इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) के अंतर्गत बलात्कार के आरोपी 18 वर्षीय किशोर को ज़मानत प्रदान करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि यह कानून, जो मूलतः नाबालिगों को यौन शोषण से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था, अब किशोरों के आपसी सहमति वाले संबंधों को अपराध ठहराने के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है।


🧑‍⚖️ न्यायालय की टिप्पणी:

न्यायमूर्ति कृष्ण पहल की एकलपीठ ने राज सोनकर नामक अभियुक्त की ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में जहाँ दोनों पक्ष किशोर हों और आपसी सहमति स्पष्ट रूप से मौजूद हो, वहाँ POCSO अधिनियम के कठोर प्रावधानों का अंधाधुंध उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने यह रेखांकित किया कि “आपसी स्नेह और सहमति की उपस्थिति” को ज़मानत याचिका तय करते समय गंभीरता से परखा जाना चाहिए, ताकि कानून का उद्देश्य न्यायिक संवेदनशीलता के साथ संतुलित रह सके।


📑 मामले की पृष्ठभूमि:

राज सोनकर को मार्च माह में एक 16 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। प्राथमिकी दर्ज करने में 15 दिनों की देरी हुई थी।


⚖️ याचिकाकर्ता का पक्ष:

अभियोजन पक्ष की ओर से कहा गया कि:

  • यह मामला एक आपसी सहमति वाले प्रेम संबंध से उत्पन्न हुआ है।
  • मेडिकल साक्ष्य अभियोजन के आरोपों की पुष्टि नहीं करता।
  • अभियुक्त का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
  • ज़मानत मिलने पर वह इसका दुरुपयोग नहीं करेगा।
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🧾 न्यायालय का निर्णय:

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों में दम पाया और FIR में हुई विलंब, मेडिकल पुष्टि के अभाव तथा शिकायतकर्ता के कथनों की अनदेखी को ध्यान में रखते हुए यह माना कि अभियुक्त को कारावास में रखना न्याय का मखौल होगा।

29 अप्रैल को पारित आदेश में कोर्ट ने अभियुक्त को जमानत पर रिहा करते हुए स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं है, और केवल अंतरिम राहत की प्रकृति में है।


🔍 न्यायिक दृष्टिकोण:

इस फैसले ने POCSO अधिनियम के अंध उपयोग और किशोरों के बीच आपसी सहमति वाले संबंधों को अपराध के रूप में देखने की प्रवृत्ति पर प्रश्नचिह्न खड़ा किया है। कोर्ट का रुख यह दर्शाता है कि संरक्षण के नाम पर किशोर प्रेम संबंधों का दमन उचित नहीं है, और न्यायालयों को सामाजिक यथार्थ एवं वैधानिक मंशा दोनों का संतुलन बनाए रखना चाहिए।

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