पत्नी की हत्या के मामले में आरोपी पति की सज़ा बरकरार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘लास्ट सीन’ और असफल स्पष्टीकरण को माना निर्णायक

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2015 में पत्नी की हत्या के आरोपी पति की उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी। कोर्ट ने कहा कि मृतका का शव पति के साथ ‘लास्ट सीन’ के बाद तुरंत मिला और आरोपी कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सका। धारा 106 साक्ष्य अधिनियम और परिस्थितिजन्य साक्ष्य को आधार बनाकर अपील खारिज की गई।

पत्नी की हत्या के मामले में आरोपी पति की सज़ा बरकरार: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘लास्ट सीन’ और असफल स्पष्टीकरण को माना निर्णायक


इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में पत्नी की हत्या के आरोपी पति जितेंद्र पाल की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा IPC की धारा 302 के तहत सुनाई गई उम्रकैद की सज़ा को बरकरार रखा।

पीठ में न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अभदेश कुमार चौधरी शामिल थे।


🔹 कोर्ट ने कहा — पति पत्नी का ‘रक्षक’, इसलिए स्पष्टीकरण का उच्च दायित्व

कोर्ट ने सख्ती से कहा:

“पति अपनी पत्नी का रक्षक होता है, इसलिए उस पर परिस्थितियों का स्पष्टीकरण देने की जिम्मेदारी सामान्य व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक होती है।”

प्रमुख तथ्य:

  • मृतका को अंतिम बार जीवित अपने पति (अपीलकर्ता) के साथ देखा गया।
  • अगले ही दिन सुबह उसका शव पास के खेत में मिला।
  • अभियुक्त यह नहीं बता सका कि वह अपनी पत्नी से कब और कैसे अलग हुआ।

🔹 ‘लास्ट सीन थ्योरी’ + ‘नो एक्सप्लेनेशन’ = निर्णायक साक्ष्य

बेंच ने कहा कि:

  • मृतका को पति के साथ आखिरी बार देखा जाना,
  • शव का कम समय के भीतर पास में मिलना,
  • और आरोपी का पूर्ण मौन
    परिस्थितिजन्य साक्ष्य की मज़बूत श्रृंखला बनाते हैं।
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कोर्ट ने यह भी माना कि:

  • प्रेम-प्रसंग (मोटिव) पूरी तरह साबित नहीं हुआ,
    परंतु यह अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करता,
    क्योंकि अन्य सबूत पर्याप्त थे।

🔹 धारा 106 साक्ष्य अधिनियम: विशेष ज्ञान वाले तथ्य का भार आरोपी पर

कोर्ट ने कहा:

“जब कोई महत्वपूर्ण तथ्य आरोपी के विशेष ज्ञान में हो, तो धारा 106 के तहत उसका स्पष्टीकरण देना आवश्यक है। आरोपी की चुप्पी अभियोजन के पक्ष में एक अतिरिक्त लिंक बनती है।”

आरोपी न तो:

  • अपनी पत्नी के गायब होने पर कोई रिपोर्ट करता है,
  • न ही ‘पंचायतनामा’ में शामिल होता है,
  • और न ही घटना की रात की गतिविधियों का कोई विवरण देता है।

कोर्ट ने इसे गंभीर संदिग्ध आचरण माना।


🔹 अभियोजन द्वारा सिद्ध महत्वपूर्ण साक्ष्य

कोर्ट ने कहा कि निम्न साक्ष्य अभियोजन के केस को मज़बूती से स्थापित करते हैं—

  • C.D.R. (कॉल डिटेल रिकॉर्ड)
  • मृतका की टूटी हुई चूड़ियाँ,
  • पंचनामा व पोस्टमॉर्टम से पुष्टि कि गला दबाकर हत्या की गई,
  • आरोपी की घटना-पश्चात संदिग्ध चुप्पी और अनुपस्थित व्यवहार

🔹 निष्कर्ष

कोर्ट के अनुसार:

  • हत्या हत्यात्मक (homicidal) थी,
  • आरोपी पति अंतिम बार मृतका के साथ था,
  • अभियोजन ने सभी परिस्थितिजन्य कड़ियाँ जोड़ीं,
  • आरोपी ने एक भी विश्वसनीय स्पष्टीकरण नहीं दिया

इसलिए:

“अभियोजन ने आरोपी की दोषसिद्धि संदेह से परे स्थापित की है।”

हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और उम्रकैद की सज़ा बरकरार रखी।


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