The plea of the accused being a juvenile at the time of the offence can be raised before any court, at any stage – Supreme Court
“जघन्य अपराध पर भी किशोर न्याय अधिनियम लागू”: सुप्रीम कोर्ट ने बलात्कार के दोषी की सजा रद्द कर मामला JJB को सौंपा
सुप्रीम कोर्ट ने एक दुष्कर्म के दोषी की सजा को रद्द करते हुए यह दोहराया कि अपराध के समय अभियुक्त के किशोर होने की दलील किसी भी अदालत के समक्ष, किसी भी चरण में उठाई जा सकती है। हालांकि, दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, न्यायालय ने यह मामला किशोर न्याय बोर्ड (JJB) को उपयुक्त आदेश पारित करने हेतु सौंप दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील वर्ष 1993 में पारित एक आदेश के विरुद्ध की गई थी, जिसके तहत अपीलकर्ता-अभियुक्त को भारतीय दंड संहिता की धारा 342 और 376 के तहत दोषी ठहराया गया था और सजा सुनाई गई थी।
न्यायमूर्ति बी. आर. गवई (मुख्य न्यायाधीश) और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने निर्णय देते हुए कहा कि यदि कोई अभियुक्त अपराध के समय 18 वर्ष से कम आयु का हो, तो उसे किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 के प्रावधानों का लाभ मिलेगा, भले ही मुकदमे की सुनवाई या अपील प्रक्रिया बाद में पूरी हुई हो।
🔹 मामला और पृष्ठभूमि:
तथ्यात्मक पृष्ठभूमि:
इस अपील में चुनौती दी गई थी साल 1993 में पारित उस आदेश को, जिसमें आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 342 (गलत तरीके से कैद करना) के तहत 6 माह के कठोर कारावास तथा धारा 376 (बलात्कार) के तहत 5 वर्षों के कठोर कारावास की सजा दी गई थी।
घटना:
17 नवंबर 1988 को, आरोपी ने कथित रूप से 11 वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार किया। पीड़िता ने अपनी मां को घटना की जानकारी दी, जिसके बाद शिकायत दर्ज की गई।
🔹 मुख्य तर्क और न्यायालय की प्रतिक्रिया:
- एफआईआर में देरी:
अभियुक्त ने तर्क दिया कि एफआईआर 20 घंटे बाद दर्ज की गई थी, जिससे संदेह पैदा होता है। परंतु पीठ ने माना कि थाना पीड़िता के घर से 26 किमी दूर था, जिससे देरी न्यायसंगत मानी गई। - केवल पीड़िता की गवाही पर दोषसिद्धि:
न्यायालय ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय हो, तो वह एकमात्र आधार पर भी दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त होती है। यहां, गवाही को चिकित्सकीय और अन्य गवाहों की पुष्टि प्राप्त थी। - किशोर होने की दलील:
अभियुक्त की जन्मतिथि 14 सितंबर 1972 पाई गई। घटना की तिथि पर उसकी उम्र 16 वर्ष 2 माह 3 दिन थी। अतः वह उस समय “किशोर” की श्रेणी में आता था।
🔹 सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां:
“किशोर होने की दलील किसी भी स्तर पर उठाई जा सकती है — भले ही फैसला हो चुका हो। यह सिद्धांत Hari Ram बनाम राजस्थान राज्य और Dharambir बनाम दिल्ली राज्य के मामलों में पहले ही स्थापित हो चुका है।”
“प्रासंगिक तथ्य यह है कि आरोपी ने अपराध के समय 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की थी, जिससे उसे 2000 अधिनियम के तहत लाभ मिलता है।”
🔹 अंतिम निष्कर्ष और निर्देश:
- सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए कहा कि अभियुक्त ने अपराध किया, यह अंतर्निहित साक्ष्यों से प्रमाणित है।
- लेकिन, उसकी आयु के आधार पर, IPC के तहत दी गई सजा को रद्द कर दिया गया और मामला अब किशोर न्याय बोर्ड को सौंप दिया गया है ताकि POSH अधिनियम की धारा 15 व 16 के अनुसार निर्णय लिया जा सके।
