इसे “मैट्रिमोनियल बैटल ऑफ महाभारत” कहा, 80 मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने 80 से अधिक “प्रतिशोधी मुकदमों” को रद्द कर विवाह खत्म किया, पत्नी को बच्चों की कस्टडी और ₹5 करोड़ का समेकित गुजारा भत्ता दिया; पति पर आगे मुकदमे करने पर रोक।
‘महाभारत’ बन चुकी वैवाहिक लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
Supreme Court of India ने एक लंबे और कड़वे वैवाहिक विवाद में असाधारण हस्तक्षेप करते हुए पति द्वारा दायर 80 से अधिक “द्वेषपूर्ण और प्रतिशोधी” मुकदमों को रद्द कर दिया।
न्यायालय ने इसे “मैट्रिमोनियल बैटल ऑफ महाभारत” बताते हुए कहा कि यह विवाद सभी सीमाएं पार कर चुका है और अब इसे समाप्त करना आवश्यक है।
अनुच्छेद 142 के तहत विवाह समाप्त
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने Article 142 Constitution of India का प्रयोग करते हुए विवाह को समाप्त कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि यह विवाह “व्यवहारिक रूप से समाप्त” हो चुका है और इसे बनाए रखना न्यायोचित नहीं होगा।
पत्नी को बच्चों की कस्टडी, पिता को विजिटेशन अधिकार
अदालत ने दोनों बच्चों की कस्टडी मां को सौंप दी, जबकि पिता को संरचित (structured) विजिटेशन अधिकार दिए गए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों के हित सर्वोपरि हैं और उनके स्थायित्व तथा सुरक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
₹5 करोड़ का समेकित गुजारा भत्ता
सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी को ₹5 करोड़ की एकमुश्त राशि देने का आदेश दिया, जिसमें स्थायी भरण-पोषण, बच्चों का खर्च और मुकदमेबाजी खर्च शामिल हैं।
यह राशि एक वर्ष के भीतर चुकाने का निर्देश दिया गया।
पति के ‘वेंडेटा लिटिगेशन’ पर कड़ी टिप्पणी
कोर्ट ने पाया कि पति, जो पेशे से वकील है, ने अपनी कानूनी जानकारी का इस्तेमाल पत्नी, उसके रिश्तेदारों और यहां तक कि उसके वकीलों को परेशान करने के लिए किया।
अदालत ने इसे “hostile, cantankerous and vindictive approach” बताते हुए कहा कि इस तरह की मुकदमेबाजी न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
सभी मुकदमे रद्द, आगे कार्रवाई पर रोक
अदालत ने दोनों पक्षों के बीच चल रहे सभी सिविल, आपराधिक और अन्य मामलों को समाप्त कर दिया।
साथ ही, पति को भविष्य में पत्नी, उसके रिश्तेदारों या वकीलों के खिलाफ कोई नया मुकदमा दायर करने से भी रोक दिया गया।
भरण-पोषण से बचने की कोशिश पर कोर्ट की टिप्पणी
कोर्ट ने पति के वित्तीय अक्षमता के दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह “कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी से बचने का बहाना” है।
अदालत ने दोहराया कि पत्नी के शिक्षित या सक्षम होने से पति की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
पृष्ठभूमि: 9 साल से अलग रह रहे थे दोनों पक्ष
दोनों पक्षों की शादी 2010 में हुई थी और 2016 से वे अलग रह रहे थे।
पत्नी ने आरोप लगाया कि पति ने भरण-पोषण नहीं दिया, जबकि पति ने कई मुकदमे दायर कर विवाद को और जटिल बना दिया।
फैमिली कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों के बावजूद पति ने भुगतान नहीं किया, जिससे विवाद और बढ़ता गया।
निष्कर्ष: ‘पूर्ण न्याय’ का प्रयोग
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि जब वैवाहिक विवाद न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बन जाए, तो अदालत को हस्तक्षेप कर “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करना चाहिए।
यह फैसला न केवल वैवाहिक विवादों में अनुच्छेद 142 के उपयोग को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी संदेश देता है कि अदालतें उत्पीड़नकारी मुकदमेबाजी को बर्दाश्त नहीं करेंगी।
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