सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘बिना दोष सिद्धि की संभावना वाले मामलों में चार्जशीट न दायर करें’

Like to Share

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना मजबूत संदेह या दोष सिद्धि की वास्तविक संभावना के चार्जशीट दायर करना न्याय प्रणाली को बोझिल बनाता है। कोर्ट ने वॉयुरिज़्म के गलत आरोपों का सामना कर रहे एक व्यक्ति को discharged करते हुए राज्य को चेताया कि ‘बिना ठोस आधार’ मुकदमे नागरिकों के निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन हैं।

“सिर्फ शक के आधार पर चार्जशीट नहीं”: सुप्रीम कोर्ट ने बेबुनियाद मुकदमों पर लगाई लगाम, ‘वॉयुरिज़्म’ केस में आरोपी को किया बरी


सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘बिना दोष सिद्धि की संभावना वाले मामलों में चार्जशीट न दायर करें’

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि जहां मजबूत संदेह भी नहीं बनता, वहां पुलिस द्वारा चार्जशीट दायर करने की प्रवृत्ति न्यायिक व्यवस्था पर भारी बोझ डालती है।
जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा—

“राज्य को ऐसे मामलों में अभियोजन नहीं करना चाहिए जिनमें दोष सिद्धि की उचित संभावना न हो। इससे नागरिकों के निष्पक्ष प्रक्रिया के अधिकार का उल्लंघन होता है।”

बेंच ने बताया कि ऐसे कमजोर मामलों के चलते अदालतों का समय उन मुकदमों पर खर्च होता है जिनका परिणाम लगभग निश्चित रूप से बरी होना होता है, जिससे गंभीर मामलों में देरी बढ़ती है।


वॉयुरिज़्म के गलत आरोप — सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया डिस्चार्ज

यह टिप्पणी उस समय आई जब सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता के एक व्यक्ति को वॉयुरिज़्म के झूठे आरोपों में दर्ज मुकदमे से मुक्त (discharge) कर दिया।

Must Read -  नागरिकता कानून विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों से अधिनिर्णय के मुद्दे तय करने को कहा, फैसले के लिए 10 जनवरी तय

🔹 IPC की धारा 354C (वॉयुरिज़्म) कब लागू होती है?

कोर्ट ने स्पष्ट किया—

वॉयुरिज़्म तभी बनता है जब आरोपी किसी महिला को ‘निजी क्रिया’ (private act) करते समय देखे या उसकी फोटो/वीडियो ले।

इस मामले में ऐसी कोई निजी स्थिति नहीं थी।


मामले की पृष्ठभूमि

  • शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि 18 मार्च 2020 को आरोपी ने उसे संपत्ति में प्रवेश करने से रोका।
  • आरोप था कि उसने उसकी तस्वीरें/वीडियो मोबाइल पर ले लीं और धमकी दी।
  • पुलिस ने 16 अगस्त 2020 को IPC सेक्शन 341, 354C और 506 के तहत चार्जशीट दायर कर दी,
    जबकि शिकायतकर्ता ने न्यायिक बयान दर्ज कराने से भी मना कर दिया था।

आरोपी की दलीलें

आरोपी ने बताया कि:

  • FIR अमलेंदु बिस्वास द्वारा रची गई साजिश थी, जो उसे और उसके पिता को संपत्ति से बेदखल करना चाहता था।
  • इस संपत्ति पर उसे पहले से ही सिविल कोर्ट से इंजंक्शन मिला हुआ था।
  • शिकायतकर्ता और उसके साथ आए लोग अवैध रूप से संपत्ति में घुसे
  • वह स्वयं कई गंभीर अपराधों (IPC 302, 307 आदि) में आरोपी थीं।
  • चार्जशीट में कहीं भी उसका किरायेदार होना साबित नहीं हुआ

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने कहा:

  • मामले में वॉयुरिज़्म का कोई भी आवश्यक तत्व मौजूद नहीं।
  • चार्जशीट में न तो निजी क्रिया का उल्लेख,
  • न कोई वीडियो/फोटो की बरामदगी,
  • न ही शिकायतकर्ता का कोई ठोस बयान।

इसलिए:

“ऐसे मामले को ट्रायल तक ले जाना न्यायिक संसाधनों का व्यर्थ उपयोग होगा।”


अंतिम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने:

  • आरोपी को सभी आरोपों से डिस्चार्ज किया
  • और कहा कि आगे की आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रहेगी।
Must Read -  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम रक्षा आवश्यकताओं की अनदेखी नहीं कर सकते,'चीन सीमा पर चौड़ी सड़कें जरूरी'-

Tags

#SupremeCourt #Voyeurism #FalseCases #ChargeSheet #IPC354C #JudicialBacklog #CriminalLaw #IndiaLegalNews #SupremeCourtJudgment #FairTrial

Leave a Comment