यौन अपराध मामलों में भाषा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द

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“पायजामा का नाड़ा तोड़ना और स्तनों को पकड़ना रेप के प्रयास के लिए पर्याप्त नहीं है”

यौन अपराध मामलों में अदालतों की भाषा पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराध मामलों में असंवेदनशील टिप्पणियों पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित फैसले को रद्द कर दिया। CJI सूर्य कांत ने कहा कि अब ऐसी भाषा और तर्कों पर देशभर की अदालतों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक भाषा और फैसले लिखने के तौर-तरीकों को लेकर कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले, जिसमें कहा गया था कि “पायजामा का नाड़ा तोड़ना और स्तनों को पकड़ना रेप के प्रयास के लिए पर्याप्त नहीं है”, को शीर्ष अदालत ने न केवल खारिज कर दिया, बल्कि इसे न्यायिक संवेदनशीलता के अभाव का उदाहरण भी बताया।

मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस फैसले पर तीखी आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की टिप्पणियाँ न केवल पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुँचाती हैं, बल्कि समाज में भी एक खतरनाक और भ्रामक संदेश देती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि अब यौन अपराधों से जुड़े मामलों में फैसले लिखने की भाषा और तर्कों को लेकर देशभर की अदालतों के लिए नए दिशानिर्देश (Guidelines) तैयार किए जाएंगे।

क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का विवादित फैसला?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 1449/2024 में 17 मार्च 2025 को दिए गए आदेश में यह टिप्पणी की थी कि आरोपी द्वारा पीड़िता का पायजामा का नाड़ा तोड़ना और उसके स्तनों को पकड़ना, भारतीय दंड संहिता के तहत “बलात्कार के प्रयास” की श्रेणी में नहीं आता। इस टिप्पणी को लेकर व्यापक आलोचना हुई और इसे पीड़ित-केंद्रित न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया गया।

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मामला स्वतः संज्ञान (suo motu) के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया, जिसे शीर्ष अदालत ने IN RE: Order dated 17.03.2025 passed by the High Court of Judicature at Allahabad in Criminal Revision No. 1449/2024 and ancillary issues शीर्षक के तहत दर्ज किया।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्य कांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यौन अपराधों की गंभीरता का मूल्यांकन केवल शारीरिक कृत्य (physical act) तक सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी की नीयत (mens rea), परिस्थितियाँ और पीड़िता पर पड़े मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक प्रभाव को भी समान रूप से महत्व देना होगा।

पीठ ने कहा कि न्यायालयों द्वारा की गई असंवेदनशील टिप्पणियाँ पीड़ित के आघात को कमतर आंकती हैं और यह संदेश देती हैं कि यौन हिंसा को केवल तकनीकी और संकीर्ण दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने दो टूक कहा कि ऐसी सोच न तो संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है और न ही महिलाओं की गरिमा और समानता के अधिकार के साथ मेल खाती है।

फैसलों की भाषा पर क्यों ज़रूरी है संवेदनशीलता?

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि न्यायिक फैसलों में प्रयुक्त भाषा केवल कानूनी निष्कर्ष तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उसका सामाजिक प्रभाव भी पड़ता है। यौन अपराधों से जुड़े मामलों में इस्तेमाल की गई शब्दावली पीड़ित के आत्मसम्मान, न्याय व्यवस्था में उसके भरोसे और समाज की सोच को सीधे प्रभावित करती है।

कोर्ट ने माना कि यदि न्यायिक आदेशों में पीड़िता के अनुभव को हल्के में लिया जाता है या अपराध की गंभीरता को कम करके प्रस्तुत किया जाता है, तो इससे पीड़ितों का न्याय प्रणाली पर विश्वास डगमगा सकता है।

नए दिशानिर्देशों का संकेत

इस पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अब समय आ गया है जब यौन अपराधों से जुड़े मामलों में निर्णय लिखने के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी दिशानिर्देश तैयार किए जाएं। इन गाइडलाइन्स का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि अदालतें फैसले देते समय संवेदनशील, संतुलित और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाएं।

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शीर्ष अदालत ने कहा कि न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, बल्कि ऐसा दिखना भी चाहिए — और यौन अपराधों के मामलों में यह सिद्धांत विशेष रूप से लागू होता है।

व्यापक प्रभाव

सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले तक सीमित है, बल्कि यह देशभर की अधीनस्थ अदालतों और उच्च न्यायालयों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में यह निर्णय यौन अपराध मामलों की न्यायिक व्याख्या, भाषा और दृष्टिकोण को नई दिशा दे सकता है।


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