“आप जैन समुदाय की भावनाओं को क्यों आहत करना चाहते हैं?”- CJI
सुप्रीम कोर्ट ने प्याज और लहसुन में “तामसिक तत्व” होने पर शोध कराने की मांग वाली जनहित याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि ऐसी याचिकाएं अदालत का समय बर्बाद करती हैं।
Supreme Court of India ने सोमवार को प्याज और लहसुन में कथित “तामसिक” या नकारात्मक तत्वों की मौजूदगी पर शोध कराने की मांग वाली एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया। अदालत ने इस याचिका को तुच्छ और निराधार बताते हुए याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई और भविष्य में इस तरह की याचिकाएं दाखिल न करने की चेतावनी भी दी।
यह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश Chief Justice of India Surya Kant की अगुवाई वाली पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया था। पीठ ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं अदालत के कीमती समय को अनावश्यक रूप से व्यर्थ करती हैं, जबकि न्यायालय के समक्ष कई गंभीर और वास्तविक मामले लंबित हैं।
अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गई थी याचिका
यह याचिका संविधान के Article 32 of the Constitution of India के तहत एक अधिवक्ता द्वारा स्वयं पेश होकर दायर की गई थी। याचिका में अदालत से आग्रह किया गया था कि एक विशेषज्ञ समिति गठित कर यह अध्ययन कराया जाए कि प्याज और लहसुन में “तामसिक” या नकारात्मक गुण मौजूद हैं या नहीं।
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि कुछ समुदायों, विशेषकर Jain community के लोग पारंपरिक रूप से प्याज, लहसुन और कुछ जड़ वाली सब्जियों का सेवन नहीं करते। इसी आधार पर उन्होंने इस विषय पर वैज्ञानिक या शैक्षणिक अध्ययन कराने की मांग की थी।
अदालत ने उठाए याचिका की मंशा पर सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिका के आधार और उद्देश्य पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि ऐसे मुद्दों को न्यायिक मंच पर उठाने का क्या औचित्य है और इससे किस प्रकार का कानूनी अधिकार प्रभावित होता है।
मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ता से सवाल करते हुए कहा,
“आप जैन समुदाय की भावनाओं को क्यों आहत करना चाहते हैं?”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि बिना किसी स्पष्ट कानूनी आधार के इस तरह के मुद्दों को उठाना न्यायालय के समय और संसाधनों का दुरुपयोग है।
विवाह विवाद का हवाला भी दिया गया
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अपने पक्ष में यह तर्क देने की कोशिश की कि हाल ही में एक वैवाहिक विवाद सामने आया था, जिसमें भोजन में प्याज के इस्तेमाल को लेकर विवाद हुआ था।
हालांकि अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि ऐसे व्यक्तिगत या सामाजिक विवादों को संवैधानिक अदालत में जनहित याचिका के रूप में लाना उचित नहीं है।
तीन अन्य PIL भी खारिज
पीठ ने यह भी नोट किया कि उसी याचिकाकर्ता द्वारा दायर तीन अन्य जनहित याचिकाएं भी न्यायालय के समक्ष लंबित थीं। अदालत ने पाया कि वे याचिकाएं भी अस्पष्ट, कमजोर और कानूनी आधार से रहित थीं।
परिणामस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने सभी चार याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि जनहित याचिका की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
अदालत की सख्त टिप्पणी
अदालत ने कहा कि न्यायपालिका का समय सीमित है और इसे वास्तविक सार्वजनिक हित के मामलों के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए। तुच्छ और निराधार याचिकाएं न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक दबाव डालती हैं।
इस टिप्पणी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भविष्य में इस प्रकार की याचिकाएं दाखिल करने से बचने की सलाह दी और मामले को समाप्त कर दिया।
Tags:
#SupremeCourt #CJISuryaKant #OnionGarlicPIL #FrivolousPIL #PublicInterestLitigation #IndianJudiciary #Article32 #LegalNewsIndia #SupremeCourtOrder #CourtNewsIndia
