शीर्ष अदालत का यह रुख इस बात का संकेत है कि धार्मिक संरचनाओं के नामकरण से जुड़े विवादों में न्यायपालिका सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप करेगी, जब तक कि स्पष्ट संवैधानिक या वैधानिक उल्लंघन सामने न हो।
पश्चिम बंगाल west Bangal के मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ नाम से नई मस्जिद निर्माण पर रोक की मांग वाली जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हस्तक्षेप से इनकार किया। जानिए पूरा विवाद और कानूनी पृष्ठभूमि।
पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम पर नई मस्जिद के कथित निर्माण को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने मामले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि इस स्तर पर न्यायिक दखल की आवश्यकता नहीं है।
यह याचिका अयोध्या निवासी अधिवक्ता देवकीनंदन पांडे द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने केंद्र सरकार और कई राज्यों को पक्षकार बनाते हुए मांग की थी कि भारत में ‘बाबर’ या ‘बाबरी मस्जिद’ के नाम पर किसी भी नई मस्जिद के निर्माण या नामकरण पर रोक लगाई जाए।
किस पीठ ने सुनवाई की?
मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता शामिल थे, ने की। सुनवाई के बाद अदालत ने याचिका को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
अदालत के इस रुख के बाद यह साफ हो गया है कि मस्जिद के नामकरण या निर्माण से जुड़े इस विवाद में फिलहाल कोई न्यायिक रोक नहीं लगाई गई है।
याचिकाकर्ता की दलील क्या थी?
अयोध्या के रौदौली निवासी देवकीनंदन पांडे ने अपनी याचिका में तर्क दिया था कि वर्ष 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या भूमि विवाद पर ऐतिहासिक और विस्तृत फैसला सुनाया था। ऐसे में ‘बाबरी’ नाम को फिर से सार्वजनिक विमर्श में लाकर नई मस्जिद का नामकरण करना देश के सामाजिक सौहार्द के लिए उचित नहीं है।
मीडिया से बातचीत में पांडे ने कहा कि बाबर एक ‘हिंदू-विरोधी आक्रमणकारी’ था और उसके नाम पर किसी भी धार्मिक ढांचे का निर्माण या नामकरण राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध है। उन्होंने इसे करोड़ों लोगों की आस्था और इतिहास से जुड़ा मुद्दा बताया।
किन्हें बनाया गया था पक्षकार?
याचिका में गृह मंत्रालय (MHA) के अलावा पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम, गुजरात और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को प्रतिवादी बनाया गया था।
याचिकाकर्ता का कहना था कि यह केवल एक राज्य का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व का मुद्दा है, क्योंकि ‘बाबरी’ नाम देश के संवेदनशील इतिहास से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार के नामकरण या निर्माण से जुड़े मुद्दों पर न्यायिक रोक लगाने के लिए ठोस कानूनी आधार आवश्यक है, जो इस याचिका में पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं किया गया।
शीर्ष अदालत का यह रुख इस बात का संकेत है कि धार्मिक संरचनाओं के नामकरण से जुड़े विवादों में न्यायपालिका सीमित दायरे में ही हस्तक्षेप करेगी, जब तक कि स्पष्ट संवैधानिक या वैधानिक उल्लंघन सामने न हो।
आगे क्या?
याचिका खारिज होने के बावजूद देवकीनंदन पांडे ने संकेत दिया है कि वे इस मुद्दे को सार्वजनिक मंचों पर उठाते रहेंगे। उनका कहना है कि यह केवल कानूनी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना से जुड़ा प्रश्न है।
फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह स्पष्ट है कि मुर्शिदाबाद में निर्माणाधीन मस्जिद के नामकरण को लेकर कोई केंद्रीय या न्यायिक प्रतिबंध लागू नहीं है।
यह मामला एक बार फिर दर्शाता है कि अयोध्या विवाद के 2019 के फैसले के बाद भी उससे जुड़े प्रतीकात्मक और भावनात्मक मुद्दे समय-समय पर न्यायिक मंच तक पहुंच रहे हैं, लेकिन हर विवाद में अदालत हस्तक्षेप करेगी—यह आवश्यक नहीं।
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