सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक पदाधिकारियों के आचरण पर गाइडलाइंस की मांग वाली जनहित याचिका सुनने से किया इनकार। कोर्ट ने कहा—याचिका चयनात्मक, राजनीतिक दल स्वयं संयम बरतें।
सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने मंगलवार को संवैधानिक पदाधिकारियों, लोक सेवकों और सार्वजनिक हस्तियों के आचरण में “संवैधानिक नैतिकता” सुनिश्चित करने हेतु दिशानिर्देश तय करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई से इंकार कर दिया।
यह याचिका 12 हस्ताक्षरकर्ताओं की ओर से दायर की गई थी, जिनमें दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग और शिक्षाविद् रूप रेखा वर्मा शामिल थे। याचिका में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कुछ सार्वजनिक व्यक्तियों द्वारा कथित भेदभावपूर्ण टिप्पणियों का उल्लेख कर ऐसे बयानों से निपटने के लिए दिशानिर्देश बनाने की मांग की गई थी।
‘चयनात्मक’ याचिका पर कोर्ट की आपत्ति
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशीय पीठ—जिसमें न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना शामिल थे—ने याचिका की चयनात्मक प्रकृति पर असंतोष व्यक्त किया।
पीठ ने टिप्पणी की, “याचिकाकर्ता प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, हम उनका सम्मान करते हैं। लेकिन केवल कुछ व्यक्तियों को निशाना बनाना उचित नहीं है। अन्य लोगों को सुविधाजनक रूप से नजरअंदाज किया गया है। यह निष्पक्ष नहीं है।”
कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि कोई याचिका पूर्ण वस्तुनिष्ठता और निष्पक्षता के साथ दायर की जाती है, तो उस पर विचार किया जा सकता है।
‘विषाक्त सार्वजनिक विमर्श’ पर बहस
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि सार्वजनिक विमर्श का स्तर लगातार गिर रहा है। उन्होंने कहा, “केवल यह न्यायालय ही कुछ कर सकता है। माहौल विषाक्त हो गया है और हमें कुछ करना होगा।”
सिब्बल ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता व्यक्तिगत आरोप हटाने को तैयार हैं। हालांकि, अदालत ने इस तरह के मामलों में न्यायिक दिशानिर्देशों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाया।
‘संयम सभी पक्षों पर लागू हो’
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने मौखिक टिप्पणी में कहा, “अंततः सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए। यदि यह न्यायालय दिशानिर्देश भी जारी करे, तो क्या आत्म-संयम और आत्म-नियमन नहीं होना चाहिए? अंततः यह देश की बंधुत्व भावना की कीमत पर होता है।”
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने भी अनुपालन के मुद्दे पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, “अदालत केवल आदेश दे सकती है, पर सवाल है कि उनका पालन होगा या नहीं? उल्लंघन के बाद ही उपाय संभव है। राजनीतिक दलों को अपने आचार संहिता का पालन स्वयं करना चाहिए।”
मुख्य न्यायाधीश ने सार्वजनिक सेवकों और सार्वजनिक व्यक्तियों के बीच अंतर रेखांकित करते हुए कहा कि लोक सेवकों के लिए पहले से विस्तृत कानून, नियम और वैधानिक ढांचा मौजूद है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में पारस्परिक सम्मान और संवैधानिक मूल्यों का पालन सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।
याचिका वापस, नई अर्जी की तैयारी
पीठ के रुख को देखते हुए कपिल सिब्बल ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी और आश्वासन दिया कि एक व्यापक और संतुलित नई याचिका दायर की जाएगी। कोर्ट ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
सुनवाई के अंत में न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की, “यह जन-लोकप्रिय अभ्यास न होकर संवैधानिक अभ्यास होना चाहिए।”
इस आदेश के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि सार्वजनिक विमर्श के स्तर पर चिंता के बावजूद, न्यायालय नीतिगत या आचार संबंधी व्यापक दिशानिर्देश तय करने में सीमित हस्तक्षेप ही करेगा—विशेषकर तब, जब याचिका चयनात्मक प्रतीत हो।
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