मतदान में बायोमेट्रिक पहचान की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने मतदान में फिंगरप्रिंट और आइरिस आधारित पहचान लागू करने की मांग पर ECI, केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया; अगले चुनावों के लिए मुद्दे की जांच होगी।
चुनावी पारदर्शिता को लेकर एक अहम जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए Supreme Court of India ने सोमवार को चुनाव आयोग, केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी किया। याचिका में मतदान केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और आइरिस आधारित बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली लागू करने की मांग की गई है, ताकि फर्जी मतदान और प्रतिरूपण जैसी गड़बड़ियों पर रोक लगाई जा सके।
🔹 किन जजों की पीठ ने सुना मामला
यह मामला मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष आया।
पीठ ने Election Commission of India, केंद्र सरकार और राज्यों से इस मुद्दे पर जवाब मांगा है।
🔹 कोर्ट की प्रारंभिक टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
- इस तरह की व्यवस्था लागू करने के लिए नियमों में बदलाव जरूरी होगा
- इसके लिए सरकार पर भारी वित्तीय बोझ भी पड़ेगा
अदालत ने यह भी कहा कि आगामी चुनावों के लिए इस मांग पर विचार संभव नहीं है, लेकिन भविष्य—विशेषकर अगले लोकसभा या राज्य चुनावों—के लिए इसकी व्यवहार्यता पर विचार किया जा सकता है।
🔹 याचिका में क्या मांग की गई
यह जनहित याचिका अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता Ashwini Kumar Upadhyay ने दायर की है।
याचिका में संविधान के Article 32 का हवाला देते हुए मांग की गई है कि:
- मतदान केंद्रों पर फिंगरप्रिंट और आइरिस स्कैनिंग अनिवार्य की जाए
- “एक व्यक्ति, एक वोट” के सिद्धांत को सख्ती से लागू किया जाए
🔹 चुनावी गड़बड़ियों पर चिंता
याचिका में कहा गया है कि मौजूदा व्यवस्था के बावजूद कई समस्याएं बनी हुई हैं:
- वोट खरीदना (bribery)
- अनुचित प्रभाव (undue influence)
- प्रतिरूपण (impersonation)
- डुप्लीकेट वोटिंग
- “घोस्ट वोटिंग”
इन समस्याओं को रोकने के लिए अधिक सख्त और तकनीकी समाधान की जरूरत बताई गई है।
🔹 मौजूदा प्रणाली की सीमाएं
याचिका के अनुसार वर्तमान पहचान प्रणाली, जो मुख्य रूप से वोटर आईडी और मैनुअल वेरिफिकेशन पर आधारित है, कई खामियों से ग्रस्त है:
- पुराने या अस्पष्ट फोटो
- रिकॉर्ड में त्रुटियां
- रियल-टाइम सत्यापन का अभाव
इन कारणों से पहचान में गड़बड़ी और दुरुपयोग की संभावना बनी रहती है।
🔹 बायोमेट्रिक सिस्टम के फायदे
याचिका में तर्क दिया गया है कि बायोमेट्रिक पहचान:
- अद्वितीय (unique) और डुप्लिकेट न होने वाली होती है
- प्रतिरूपण और बहु-मतदान को रोक सकती है
- प्रवासी मतदाताओं से जुड़े मुद्दों को हल कर सकती है
- “घोस्ट वोटर्स” की पहचान खत्म कर सकती है
इसके अलावा, यह एक रियल-टाइम ऑडिट ट्रेल तैयार कर पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ा सकती है।
🔹 आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम निर्णय नहीं दिया है, लेकिन नोटिस जारी कर इस मुद्दे को गंभीर विचार के लिए खोल दिया है।
अब यह देखना अहम होगा कि:
- चुनाव आयोग और सरकार इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं
- क्या भविष्य के चुनावों में तकनीक आधारित पहचान प्रणाली लागू की जा सकती है
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