मेधा सूची में होने के बावजूद नियुक्ति से वंचित अभ्यर्थियों को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि मेधा सूची में होने के बावजूद नियुक्ति से वंचित LDC अभ्यर्थियों को नियुक्ति देकर भेदभाव दूर किया जाए और Notional लाभ प्रदान किए जाएं।
📌 पृष्ठभूमि: नियुक्ति से वंचित अभ्यर्थियों की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
Guruprosad Banerjee v. State of W.B. में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठा—क्या मेधा सूची में स्थान होने के बावजूद अभ्यर्थियों को नियुक्ति से वंचित करना भेदभाव है?
यह विशेष अनुमति याचिका (SLP) Calcutta High Court के 6 मई 2025 के निर्णय के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ताओं को स्टाम्प एवं राजस्व विभाग, पश्चिम बंगाल में लोअर डिवीजन क्लर्क (LDC) पद पर नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था।
⚖️ याचिकाकर्ताओं का पक्ष: मेधा सूची में होने के बावजूद अन्याय
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे चयन सूची में मेरिट के आधार पर पात्र थे, फिर भी उन्हें नियुक्ति नहीं दी गई। उनका कहना था कि यह स्पष्ट रूप से समान अवसर के सिद्धांत का उल्लंघन है और उनके साथ भेदभाव किया गया है।
रिकॉर्ड के अनुसार, याचिकाकर्ता क्रमशः मेरिट सूची में 11वें और 13वें स्थान पर थे, जो उपलब्ध रिक्तियों के दायरे में आते थे।
🏛️ राज्य का पक्ष: रिक्तियों और चयन प्रक्रिया का बचाव
राज्य सरकार ने अपने जवाब में कहा कि West Bengal Administrative Tribunal के एक पूर्व निर्णय (OA No. 85720/2008) के बाद नई नियुक्तियाँ की गईं और सामान्य श्रेणी की कुल रिक्तियों की संख्या 16 तक बढ़ा दी गई।
हालांकि, राज्य ने यह भी स्वीकार किया कि चयनित 16 अभ्यर्थियों में से 3 ने जॉइन नहीं किया, जिससे पद रिक्त रह गए।
🔍 सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: ‘अंतिम अवसर’ और व्यक्तिगत उपस्थिति का निर्देश
मामले की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की पीठ—Justice J.K. Maheshwari और Justice Atul S. Chandurkar—ने 23 मार्च 2026 को राज्य को “अंतिम अवसर” देते हुए एक सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
साथ ही, संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया गया और चेतावनी दी गई कि अनुपालन न होने पर कड़े आदेश पारित किए जा सकते हैं।
📊 कोर्ट का विश्लेषण: राज्य के स्वीकारोक्ति ने पलटा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के हलफनामे पर गौर करते हुए पाया कि 16 में से 3 चयनित अभ्यर्थियों ने सेवा जॉइन नहीं की, जिससे रिक्तियाँ बनी रहीं।
ऐसे में, मेरिट सूची में 11वें और 13वें स्थान पर होने के कारण याचिकाकर्ता स्पष्ट रूप से इन रिक्तियों के दायरे में आते थे।
कोर्ट ने माना कि यह स्थिति याचिकाकर्ताओं के साथ भेदभाव को दर्शाती है, जिसे सुधारना आवश्यक है।
✅ सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: नियुक्ति और नोटional लाभ देने का आदेश
तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि:
- याचिकाकर्ताओं को नियुक्ति देकर भेदभाव को दूर किया जाए
- उन्हें सेवा में वरिष्ठता और अन्य “notional benefits” प्रदान किए जाएं
यह निर्देश न्यायालय द्वारा “अनुरोध” के रूप में दिया गया, लेकिन इसकी बाध्यता स्पष्ट रूप से रेखांकित की गई।
⏳ अगली सुनवाई: अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश
कोर्ट ने राज्य सरकार को 11 मई 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि आदेश का पालन किया गया है।
📌 निष्कर्ष: समान अवसर के सिद्धांत की पुनः पुष्टि
यह मामला एक बार फिर स्पष्ट करता है कि यदि कोई अभ्यर्थी मेरिट सूची में है और रिक्तियाँ उपलब्ध हैं, तो उसे नियुक्ति से वंचित करना संविधान के समानता सिद्धांत के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट का यह रुख न केवल याचिकाकर्ताओं को राहत देता है, बल्कि भविष्य में नियुक्ति प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण संदेश देता है।
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