हाईकोर्ट चार्जशीट व ट्रायल की समय-सीमा तय नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

Like to Share

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट जांच पूरी करने, चार्जशीट दाखिल करने या ट्रायल निपटाने की तय समय-सीमा नहीं थोप सकता। मद्रास हाईकोर्ट के निर्देशों को “अनावश्यक” बताते हुए हटाया गया।

A. Shankar बनाम Secretary to Government (2026)


हाईकोर्ट चार्जशीट व ट्रायल की समय-सीमा तय नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

संक्षेप में निर्णय

सुप्रीम कोर्ट की डिवीजन बेंच (जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा) ने मद्रास हाईकोर्ट के उन निर्देशों को हटाने का आदेश दिया, जिनमें जांच पूरी करने, चार्जशीट दाखिल करने और लंबित आपराधिक ट्रायल को तय समय-सीमा में निपटाने का आदेश दिया गया था। कोर्ट ने इन निर्देशों को “अनावश्यक और अनुचित” करार देते हुए कहा कि ऐसे आदेश जांच एजेंसी के वैधानिक विवेक में हस्तक्षेप करते हैं और निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित कर सकते हैं।


मामला क्या था?

अपीलकर्ता ने 08-02-2025 को शिकायत दर्ज कराई थी, जिसके बाद 23-05-2025 और 21-06-2025 को दो और शिकायतें दी गईं। आरोप था कि चेन्नई के पुलिस आयुक्त द्वारा सत्ता के दुरुपयोग के तहत झूठे मामले दर्ज किए जा रहे हैं और जांच पूर्वनियोजित तरीके से की जा रही है ताकि उन्हें फंसाया जा सके। शिकायतों पर कार्रवाई न होने का आरोप लगाते हुए अपीलकर्ता ने अनुच्छेद 226 के तहत मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया और तमिलनाडु पुलिस (सुधार) अधिनियम, 2013 के अनुसार कार्रवाई तथा Savukku Media के कामकाज में हस्तक्षेप से रोक की मांग की।


हाईकोर्ट का आदेश

सिंगल जज ने पाया कि अपीलकर्ता 37 मामलों में आरोपी है—24 मामलों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और 13 मामलों में जांच लंबित है। याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने:

  • 13 लंबित मामलों में चार माह में जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल करने, और
  • 24 मामलों के ट्रायल छह माह में निपटाने
    का निर्देश दिया।
Must Read -  नाबालिग बच्चों की हिरासत के मामलों में, बंदी प्रत्यक्षीकरण का उपयोग हिरासत की वैधता को उचित ठहराने या जांचने और रिट की अनिवार्यता के लिए नहीं हो सकता: HC

इन्हीं निर्देशों को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।


सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ

  • रिट कोर्ट की सीमाएँ: हाईकोर्ट यह आदेश नहीं दे सकता कि हर हाल में तय समय में चार्जशीट दाखिल हो या जांच पूरी हो—यह जांच अधिकारी के वैधानिक विवेक को खत्म करता है।
  • निष्पक्ष ट्रायल पर खतरा: ट्रायल के चरण की परवाह किए बिना समय-सीमा तय करना निष्पक्ष सुनवाई को नुकसान पहुँचा सकता है।
  • कानूनी सिद्धांत: “कोई व्यक्ति अदालत का दरवाज़ा खटखटाने पर पहले से बदतर स्थिति में नहीं डाला जा सकता।”
  • कार्यपालिका का क्षेत्र: Kunga Nima Lepcha v. State of Sikkim पर भरोसा करते हुए कहा गया कि जांच शुरू कराने/दिशा देने का आदेश देना सामान्यतः रिट कोर्ट का काम नहीं है।
  • CrPC/BNSS की योजना: चार्जशीट दाखिल करने से पहले जांच अधिकारी को स्वतंत्र रूप से यह सकारात्मक राय बनानी होती है कि सामग्री अभियोजन के लिए पर्याप्त है। अदालत के दबाव में ऐसा करना अवैध है।

अंतिम निर्देश

  • मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के पैराग्राफ 8 और 9 हटाए गए
  • इन निर्देशों के आधार पर उठाए गए कदम अप्रभावी घोषित किए गए; impugned आदेश के बाद दाखिल चार्जशीट्स रद्द की गईं।
  • जहां जांच लंबित/पुनःखोली गई है, वहां जांच अधिकारी स्वतंत्र रूप से सामग्री के आधार पर राय बनाकर धारा 173 CrPC / धारा 193 BNSS के तहत उचित रिपोर्ट दाखिल करेंगे।
  • ट्रायल कोर्ट कानून के अनुसार आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र रहेंगे।
Must Read -  हत्या आरोप की पुष्टि के लिए मर्डर का मकसद साबित होना चाहिए और परिस्थितियों की श्रृंखला पूरी होनी चाहिए: इलाहाबाद हाईकोर्ट

क्यों है यह फैसला महत्वपूर्ण?

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि न्यायिक निगरानी की सीमा कहाँ खत्म होती है और जांच/अभियोजन में कार्यपालिका के वैधानिक विवेक की रक्षा क्यों जरूरी है—ताकि निष्पक्ष ट्रायल और प्रक्रियात्मक न्याय सुरक्षित रहे।


Tags:
#सुप्रीमकोर्ट #हाईकोर्ट #चार्जशीट #आपराधिकजांच #निष्पक्षसुनवाई #CrPC #BNSS #WritJurisdiction #SupremeCourt #HighCourt #CriminalInvestigation #ChargeSheet #FairTrial

Leave a Comment