सीनियर एडवोकेट और पूर्व SCBA अध्यक्ष आदिश सी. अग्रवाल ने अपने WhatsApp अकाउंट के अचानक निलंबन को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। बिना नोटिस हुई कार्रवाई को उन्होंने अपनी पेशेवर स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।
WhatsApp द्वारा अचानक अकाउंट निलंबन पर वरिष्ठ वकील आदिश अग्रवाल की दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती
पूर्व सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश सी. अग्रवाल ने अपने WhatsApp अकाउंट के अचानक और एकतरफा निलंबन को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने आरोप लगाया है कि यह कार्रवाई बिना किसी पूर्व सूचना, कारण बताओ नोटिस या डेटा रिकवरी के अवसर के की गई और इसका सीधा प्रभाव उनके पेशेवर कामकाज और निजी अधिकारों पर पड़ा है।
अग्रवाल ने अपनी रिट याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 व 227 के तहत दाखिल की है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि WhatsApp की ओर से की गई यह कार्रवाई मनमानी, असंवैधानिक और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
🔹 याचिका में लगाए गए मुख्य आरोप
1. बिना नोटिस अकाउंट ब्लॉक — वर्षों का प्रोफेशनल डेटा गायब
याचिका के अनुसार WhatsApp ने अचानक उनका अकाउंट निलंबित कर दिया, जिसमें मौजूद था:
- कानूनी ड्राफ्ट
- ब्रीफिंग नोट्स
- क्लाइंट कम्युनिकेशन
- बार काउंसिल चुनाव से जुड़े दस्तावेज
- गोपनीय केस रिकॉर्ड
इन सभी के नष्ट होने से उनके पेशेवर कार्य पर गहरा असर पड़ा है।
2. अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस के बीच अकाउंट ब्लॉक— पेशेवर नुकसान
निलंबन का समय अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है। अग्रवाल उस समय
बैंकॉक, लंदन, दुबई सहित कई देशों में चल रहे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन और व्यावसायिक गतिविधियों में व्यस्त थे।
ऐसे समय पर अकाउंट ब्लॉक होने से उनका पेशेवर संचार और चुनावी प्रक्रिया में भागीदारी बाधित हुई।
3. मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
याचिका में दावा किया गया है कि यह कार्रवाई निम्न मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है—
- Article 14: समानता का अधिकार
- Article 19(1)(a): अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- Article 19(1)(g): व्यवसाय/पेशा चलाने का अधिकार
- Article 21: जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार
कानून के आधार पर उन्होंने कहा कि WhatsApp की कार्रवाई
“मनमानी, असंगत और बिना उचित प्रक्रिया के” की गई।
🔹 KS Puttaswamy के फैसले का हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक KS Puttaswamy (Privacy Judgment) का उल्लेख किया गया है, जिसमें कहा गया है कि व्यक्ति का संचार और डिजिटल डेटा उसकी गरिमा और स्वायत्तता का हिस्सा है।
अग्रवाल ने तर्क दिया कि उनके WhatsApp डेटा तक पहुंच रोकना
डिजिटल निजता और पेशेवर स्वतंत्रता पर असंगत प्रतिबंध है।
🔹 WhatsApp की कानूनी कमियों पर भी सवाल
याचिका में कहा गया है कि—
WhatsApp ने न ग्रिवेंस ऑफिसर नियुक्त किया, न ही कोई त्वरित शिकायत निवारण प्रणाली बनाई
- कई e-mail भेजे गए
- 13 अक्टूबर को प्रतिनिधि द्वारा गुरुग्राम कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से भी शिकायत दी गई
परंतु कोई जवाब नहीं मिला।
🔹 डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड का गठन न होना— बड़ी चिंता
याचिका में यह भी आरोप है कि
सरकार द्वारा डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड का गठन न करना
(जैसा कि Digital Personal Data Protection Act में आवश्यक है)
उपयोगकर्ताओं को उपयुक्त कानूनी उपायों से वंचित करता है।
इस कारण अग्रवाल के पास हाईकोर्ट जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
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