सुप्रीम कोर्ट ने अपने 12 सितंबर 2025 के फैसले से प्रोफेसर निर्मल कांति चक्रवर्ती पर की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी हटा दी। कोर्ट ने कहा कि बिना दोष सिद्ध किए किसी पर कलंक लगाने वाली टिप्पणी देना “दंड जैसा प्रभाव” पैदा करता है और प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
SC ने प्रोफेसर निर्मल कांति चक्रवर्ती पर की गई कठोर टिप्पणी हटाई—‘बिना दोष साबित किए कलंक लगाना अनुचित’
सुप्रीम कोर्ट: बिना दोष सिद्ध किए ‘कलंकित’ करने वाली टिप्पणी अनुचित, प्रोफेसर निर्मल कांति चक्रवर्ती के खिलाफ टिप्पणी हटाई
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में यह स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रतिकूल टिप्पणी (adverse remark) देना, जबकि उसके खिलाफ दोष सिद्ध न हुआ हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और ऐसा करना “बिना दोष सिद्ध किए सज़ा देने” जैसा है।
यह आदेश प्रोफेसर निर्मल कांति चक्रवर्ती, पूर्व कुलपति—NUJS कोलकाता—द्वारा दायर एक Miscellaneous Application पर पारित हुआ।
पीठ—
- जस्टिस पंकज मित्तल
- जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
ने 12 सितंबर 2025 के अपने ही फैसले (पैरा 34) में मौजूद उस वाक्य को हटाने का निर्देश दिया जो उनके लिए “stigmatic” माना गया।
🔹 आवेदन क्यों दायर किया गया?
Senior Advocate डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (आवेदक की ओर से) ने दलील दी:
- आवेदक को किसी भी आरोप में दोषी नहीं ठहराया गया,
- ऐसे में “कलंक लगाने वाली टिप्पणी” देना कानूनी रूप से अस्वीकार्य,
- और यह “दंड देने जैसा प्रभाव” डालता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आवेदक review नहीं मांग रहा, बल्कि सिर्फ़ एक विशेष वाक्य की expunction चाहता है।
दूसरी ओर, Senior Advocate मीना कुमारी अरोड़ा (अपीलकर्ता की ओर से) ने कहा कि—
- आवेदन non maintainable है,
- उचित उपाय Review Petition होना चाहिए,
- कोर्ट ने अपनी “पूर्ण चेतना के साथ” वह टिप्पणी लिखी थी।
🔹 सुप्रीम कोर्ट का रुख
कोर्ट ने maintainability पर विस्तृत चर्चा नहीं की और कहा:
“हम इस प्रश्न में नहीं पड़ना चाहते कि आवेदन maintainable है या नहीं। इसे miscellaneous application या review application मानकर भी हम इसे निर्णयार्थ ले रहे हैं।”
सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी हटाने के मुख्य कारण बताए:
- आवेदक के खिलाफ कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ है।
- टिप्पणी का प्रभाव कलंक लगाने जैसा था।
- संबंधित घटना अब भी जांच/ट्रायल में है।
- ऐसे अवलोकन व्यक्तिगत प्रतिष्ठा पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
- केवल बहस में आरोप लगाए जाने से व्यक्ति दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस मित्तल ने लिखा:
“चूँकि merits पर कोई finding नहीं है, उक्त टिप्पणी को हटाना उचित है, भले ही मामला merits पर बहस किया गया हो।”
🔹 अंतिम आदेश
कोर्ट ने निर्देश दिया:
- पैरा 34 का वह वाक्य, जो “Thus” से प्रारंभ होकर “personally” तक समाप्त होता है,
हटा दिया जाए।
आवेदन (I.A. No. 242096/2025) स्वीकार किया गया।
🔹 कानूनी सिद्धांत जो यह आदेश स्थापित करता है
✔ अदालतें बिना दोष सिद्ध किए किसी व्यक्ति पर कलंक नहीं लगा सकतीं।
✔ प्रतिकूल टिप्पणियाँ भी “दंड” जैसी प्रभावी होती हैं; इसलिए न्यायिक संयम आवश्यक।
✔ प्रतिष्ठा, करियर और सार्वजनिक छवि—ये सभी न्यायिक टिप्पणियों से प्रभावित होते हैं।
✔ Allegations ≠ Findings of Guilt
यह निर्णय न्यायपालिका की इस संवेदनशील जिम्मेदारी को रेखांकित करता है कि टिप्पणियाँ भी न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और अत्यधिक सावधानी से की जानी चाहिए।
Case Title:
Vaneeta Patnaik vs. Nirmal Kanti Chakrabarti & Ors.
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