सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस्तीफा देने पर पूर्व सेवा जब्त हो जाती है और पेंशन नहीं मिलती, लेकिन ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट अनिवार्य हैं। DTC कर्मचारी अशोक कुमार दाबस मामले में कोर्ट ने 6% ब्याज के साथ भुगतान का निर्देश दिया। पूरी कानूनी रिपोर्ट पढ़ें।
‘रेज़िग्नेशन बनाम वॉलेंटरी रिटायरमेंट’: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने 9 दिसंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्पष्ट कर दिया कि ‘त्यागपत्र (Resignation)’ और ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (Voluntary Retirement)’ दो अलग-अलग कानूनी अवधारणाएँ हैं, और दोनों के परिणाम भी अलग होते हैं। कोर्ट ने दिवंगत अशोक कुमार दाबस की सिविल अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए उनके कानूनी वारिसों को ग्रेच्युटी और लीव एनकैशमेंट के भुगतान का अधिकार दिया, लेकिन पेंशन का दावा खारिज कर दिया।
30 साल नौकरी, फिर भी पेंशन नहीं—क्यों?
अशोक कुमार दाबस 1985 में दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन (DTC) में कंडक्टर नियुक्त हुए थे। उन्होंने 2014 में पारिवारिक कारणों से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा स्वीकार भी हो गया और बाद में इसे वापस लेने का अनुरोध भी अस्वीकृत हुआ। DTC ने 2015 में आदेश जारी कर कहा कि वे सिर्फ प्रॉविडेंट फंड के हकदार हैं—कोई अन्य लाभ नहीं।
कर्मचारी ने CAT और फिर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन दोनों मंचों ने राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पेंशन की मांग: क्या इस्तीफे को ‘वॉलेंटरी रिटायरमेंट’ माना जा सकता है?
अपीलकर्ता की ओर से बहस हुई कि दाबस ने 20 वर्ष से अधिक सेवा की थी, इसलिए उनके इस्तीफे को शाब्दिक रूप में न पढ़कर ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति’ माना जाना चाहिए। तर्क दिया गया कि—
- पेंशन “बाउंटी नहीं, अर्जित अधिकार” है,
- एक मामूली गलती—जैसे इस्तीफे शब्द का उपयोग—से जीवनभर की कमाई जब्त कर लेना अनुचित है।
वकीलों ने RBI v. Cecil Dennis Solomon और Shashikala Devi v. Central Bank of India जैसे फैसलों पर भरोसा किया।
DTC का जवाब: कानून स्पष्ट है—इस्तीफा = सेवा समाप्त + फायदा जब्त
कॉरपोरेशन ने Rule 26(1) of CCS Pension Rules, 1972 पर निर्भर करते हुए तर्क दिया कि—
“इस्तीफा देने से पूर्व की सेवा स्वतः जब्त हो जाती है, जब तक कि नियुक्ति प्राधिकारी सार्वजनिक हित में उसे वापस लेने की अनुमति न दे।”
DTC ने यह भी बताया कि कर्मचारी के खिलाफ कई अनुशासनात्मक कार्यवाहियाँ थीं और संभवतः इसी कारण उन्होंने इस्तीफा दिया।
सुप्रीम कोर्ट की गहन व्याख्या: Rule 26 निर्णायक
जस्टिस राजेश बिंदल ने पूरे नियमों—Rule 26, Rule 36, Rule 48 और Rule 48-A—का विस्तृत विश्लेषण किया और BSES Yamuna Power Ltd. वाले हालिया फैसले पर भरोसा किया।
कोर्ट ने कहा:
“इस्तीफे को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति में तब्दील करना नियम 26 की पूरी योजना को निष्प्रभावी कर देगा। यह स्वीकार्य नहीं।”
इसलिए कर्मचारी की पूरी पिछली सेवा forfeited मानी गई और पेंशन का दावा खारिज कर दिया गया।
परंतु ग्रेच्युटी पर मिला बड़ा राहत का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने ग्रेच्युटी पर बिल्कुल अलग रुख अपनाया और Payment of Gratuity Act, 1972 को निर्णायक माना। इस कानून में स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि:
- इस्तीफे (resignation) पर भी ग्रेच्युटी देनी होती है,
- यदि संस्थान ने धारा 5 के तहत छूट नहीं ली है, तो कानून अनिवार्य रूप से लागू होता है।
DTC यह साबित नहीं कर पाया कि उसे इस कानून से छूट मिली है।
अदालत ने कहा:
“जब 1972 का अधिनियम लागू है, तो ग्रेच्युटी का भुगतान नकारा नहीं जा सकता, चाहे कर्मचारी ने इस्तीफा ही क्यों न दिया हो।”
लीव एनकैशमेंट भी मिलेगा
कॉरपोरेशन की ओर से स्वीकार किया गया कि मृतक कर्मचारी को लीव एनकैशमेंट की राशि दे दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी मंजूर कर लिया।
6 हफ्ते में भुगतान, 6% ब्याज के साथ
अदालत ने DTC को निर्देश दिया कि—
- ग्रेच्युटी
- लीव एनकैशमेंट
दोनों का भुगतान 6 सप्ताह के भीतर किया जाए,
और 2014 में इस्तीफे की तारीख से लेकर भुगतान की तारीख तक 6% वार्षिक ब्याज दिया जाए।
🔖Tags
#SupremeCourt #PensionRules #CCSPensionRules #DTC #ResignationVsRetirement #GratuityAct #LegalNews #AshokKumarDabas #IndianJudiciary #ServiceLaw
