राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने अधिवक्ताओं की हड़ताल को अनुच्छेद 21 का उल्लंघन बताते हुए कहा कि किसी आरोपी की गरीबी उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
अधिवक्ताओं की हड़ताल पर राजस्थान हाईकोर्ट सख़्त: गरीबी आरोपी की स्वतंत्रता में बाधा नहीं बन सकती
राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवैधानिक रूप से दूरगामी फैसले में अधिवक्ताओं की हड़ताल पर कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी आरोपी की आर्थिक असमर्थता उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में बाधा नहीं बन सकती।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढंड ने कहा कि वकीलों द्वारा न्यायिक कार्य का बहिष्कार विचाराधीन कैदियों और बंदियों के मौलिक अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन है, विशेष रूप से तब, जब मामला किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा हो।
यह फैसला 24 जनवरी 2026 को एनडीपीएस एक्ट के तहत दोषसिद्ध आरोपी राजेश कुशवाह की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया गया।
हड़ताल से अदालतों का ठप होना अस्वीकार्य
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि—
- जोधपुर मुख्यपीठ और जयपुर पीठ की
- तीन बार एसोसिएशनों ने
- प्रत्येक माह दो कार्यशील शनिवार घोषित किए जाने के विरोध में
हड़ताल का आह्वान किया
इसके परिणामस्वरूप अधिवक्ता न्यायिक कार्य से अनुपस्थित रहे और अदालतों का काम बाधित हुआ।
न्यायमूर्ति ढंड ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय
Ex-Capt. Harish Uppal v. Union of India (2003)
का हवाला देते हुए दो टूक कहा कि—
“अधिवक्ताओं को न तो हड़ताल करने का अधिकार है और न ही सांकेतिक न्यायिक बहिष्कार का।”
न्याय चाहने वाला आम नागरिक ‘बंधक’ नहीं बनाया जा सकता
हाईकोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस प्रकार की हड़तालें—
- न्याय चाहने वाले आम नागरिकों को “बंधक” बना लेती हैं
- न्यायिक व्यवस्था को ठप कर देती हैं
अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक कार्य का बहिष्कार लोकतांत्रिक साधन नहीं हो सकता।
संवाद से समाधान, हड़ताल से नहीं
कोर्ट ने कहा कि—
“किसी भी समस्या का समाधान संवाद, बहस और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निकलता है, न कि न्यायिक कार्य के बहिष्कार से।”
हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि—
- बार एसोसिएशनों की आपत्तियों पर विचार के लिए
- 6 जनवरी 2026 को पहले ही एक समिति गठित की जा चुकी है
- जिसकी रिपोर्ट अभी लंबित है
इसके बावजूद हड़ताल का रास्ता अपनाना अनावश्यक और अनुचित है।
कार्यशील शनिवारों को लेकर पहले से स्पष्ट निर्देश
अदालत ने 23 जनवरी 2026 की Cause List में प्रकाशित नोट का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि—
- कार्यशील शनिवारों को
- केवल पुराने लंबित मामलों को
- स्वैच्छिक आधार पर सुना जाएगा
- और उन दिनों अधिवक्ताओं की उपस्थिति अनिवार्य नहीं होगी
इसके बावजूद हड़ताल करना, अदालत के अनुसार, न्यायिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष बाधा उत्पन्न करता है।
हड़ताल = अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
न्यायमूर्ति ढंड ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक टिप्पणी करते हुए कहा कि—
“जब अधिवक्ता अदालत का बहिष्कार करते हैं, तो यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त त्वरित न्याय के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।”
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रस्तावित अधिवक्ता संशोधन विधेयक, 2025 में भी वकीलों द्वारा न्यायिक कार्य के बहिष्कार पर रोक लगाने का प्रावधान शामिल किया गया है।
विरोध का अधिकार है, लेकिन निरंकुश नहीं
अदालत ने यह स्वीकार किया कि—
- लोकतांत्रिक व्यवस्था में
- विरोध और असहमति व्यक्त करना
एक मौलिक अधिकार है
लेकिन यह अधिकार—
- निरंकुश नहीं है
- इसे शांतिपूर्ण, अहिंसक और
- न्यायिक प्रक्रिया को बाधित किए बिना
प्रयोग किया जाना चाहिए।
आरोपी की रिहाई में देरी = न्यायिक विफलता
मामले के तथ्यों पर आते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि—
- आरोपी राजेश कुशवाह को
- 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी
- वह लगभग 7 वर्ष 11 माह की सजा काट चुका था
- उसकी सजा 7 अक्टूबर 2025 को निलंबित की जा चुकी थी
इसके बावजूद वह जेल में बंद रहा, केवल इसलिए क्योंकि—
- वह ₹1,00,000 का जुर्माना जमा करने में असमर्थ था
गरीबी सजा का आधार नहीं बन सकती
न्यायमूर्ति ढंड ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“यदि सजा निलंबन के दौरान लगाई गई शर्तें ऐसी हों, जिन्हें आरोपी अपनी आर्थिक स्थिति के कारण पूरा न कर सके, तो यह अपील के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को निष्फल करने जैसा होगा।”
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले
CBI v. Ashok Sirpal
का हवाला देते हुए कहा कि—
जुर्माना जमा करने की शर्त ऐसी नहीं होनी चाहिए, जिसे पूरा करना वास्तविक रूप से असंभव हो।
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