‘द केरल स्टोरी 2’ पर हाईकोर्ट बनाम निर्माता: निर्माता Vipul Amrutlal Shah ने Kerala High Court के उस आदेश का विरोध करते हुए जवाबी हलफनामा दायर किया
‘The Kerala Story 2’ की रिलीज से पहले केरल हाईकोर्ट ने स्क्रीनिंग का आदेश दिया। निर्माता विपुल अमृतलाल शाह ने जवाबी हलफनामा दायर कर कहा—फिल्म का परीक्षण केवल सेंसर बोर्ड का अधिकार, रिलीज पर रोक से होगा भारी नुकसान।
फिल्म ‘The Kerala Story 2’ की रिलीज से पहले विवाद तेज हो गया है। निर्माता Vipul Amrutlal Shah ने Kerala High Court के उस आदेश का विरोध करते हुए जवाबी हलफनामा दायर किया है, जिसमें अदालत ने रिलीज से पहले फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग कराने को कहा था।
निर्माता ने स्पष्ट किया कि फिल्मों की जांच और प्रमाणन का अधिकार केवल Central Board of Film Certification (CBFC) के पास है। हाईकोर्ट को फिल्म की सामग्री का पूर्वावलोकन कर उसका मूल्यांकन करने का अधिकार नहीं है।
“सेंसर बोर्ड ही सक्षम प्राधिकरण”
हलफनामे में कहा गया है कि फिल्म को सभी संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हुए सेंसर बोर्ड से विधिवत प्रमाणपत्र मिल चुका है। विशेषज्ञों द्वारा फिल्म देखे जाने के बाद ही इसे स्क्रीनिंग की अनुमति दी गई थी और वे कथा-वस्तु से संतुष्ट थे।
शाह ने अदालत को बताया कि जब तक सेंसर बोर्ड के निर्णय में कोई गंभीर त्रुटि न हो, तब तक फिल्म की रिलीज पर रोक नहीं लगाई जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि रिलीज टालने से निर्माताओं को भारी वित्तीय नुकसान होगा।
हाईकोर्ट का आदेश
मंगलवार को केरल हाईकोर्ट ने निर्देश दिया था कि फिल्म की रिलीज से पहले कोच्चि में अदालत के लिए विशेष स्क्रीनिंग की व्यवस्था की जाए। यह आदेश ऐसे समय आया जब फिल्म के ट्रेलर और विषयवस्तु को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही थीं।
इससे पहले यह खबर भी चली थी कि अदालत के हस्तक्षेप के बाद फिल्म का टीज़र हटाया गया है। हालांकि निर्माता कंपनी Sunshine Pictures ने बयान जारी कर इन खबरों को “पूरी तरह झूठा और भ्रामक” बताया। कंपनी ने कहा कि मामला विचाराधीन (sub judice) है और किसी भी अदालत ने किसी सामग्री को हटाने का आदेश नहीं दिया है।
फिर विवादों में ‘केरल स्टोरी’
‘The Kerala Story 2’ वर्ष 2023 में आई राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म The Kerala Story का सीक्वल है। पहली फिल्म ने भी व्यापक राजनीतिक और सामाजिक बहस छेड़ी थी।
सीक्वल की कहानी तीन युवतियों के जीवन पर केंद्रित है, जो कथित तौर पर भ्रामक विवाह और जबरन धर्मांतरण के जाल में फंसती हैं। ट्रेलर लॉन्च के बाद से विपक्षी नेताओं, कुछ सेलिब्रिटीज और सोशल मीडिया यूज़र्स ने इसे “प्रोपेगेंडा” करार दिया है। वहीं, फिल्मकारों का दावा है कि यह शोध-आधारित वास्तविक घटनाओं पर आधारित है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम न्यायिक निगरानी
मामला अब एक बड़े संवैधानिक सवाल की ओर बढ़ता दिख रहा है—क्या सेंसर बोर्ड की मंजूरी के बाद भी अदालतें फिल्म की सामग्री का पूर्व परीक्षण कर सकती हैं?
निर्माता का तर्क है कि यदि हर विवादित फिल्म को अदालत में पहले दिखाना अनिवार्य कर दिया जाए, तो यह रचनात्मक स्वतंत्रता और प्रमाणन की स्थापित प्रक्रिया को कमजोर करेगा। दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का पक्ष है कि संवेदनशील विषयों पर बनी फिल्मों की न्यायिक समीक्षा सार्वजनिक शांति और सामुदायिक सौहार्द के हित में आवश्यक हो सकती है।
फिलहाल फिल्म शुक्रवार को निर्धारित रिलीज की ओर बढ़ रही है, लेकिन हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और संभावित कानूनी कदम इस बहस को और गहरा कर सकते हैं।
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