व्यक्ति के गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार और भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी ढांचे को लेकर एक बार फिर चर्चा
सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ में रह रहे हरीश राणा के मामले में लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट हटाने की अनुमति दी। कोर्ट ने गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार पर अपने 2018 के कॉमन कॉज फैसले का हवाला दिया।
Supreme Court की दो सदस्यीय पीठ ने बुधवार को एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए 31 वर्षीय हरीश राणा के लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट को वापस लेने की अनुमति दे दी। अदालत ने यह निर्णय हरीश के परिवार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया, जिसमें उनके दीर्घकालिक चिकित्सकीय हालात और विशेषज्ञों की राय को ध्यान में रखा गया।
यह मामला व्यक्ति के गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार और भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी ढांचे को लेकर एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
2013 की दुर्घटना के बाद से गंभीर हालत
हरीश राणा Panjab University के छात्र थे। वर्ष 2013 में एक दुर्घटना के दौरान वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। इस हादसे में उनके सिर में गंभीर चोटें आईं, जिसके बाद वह 100 प्रतिशत क्वाड्रीप्लेजिक विकलांगता का शिकार हो गए।
पिछले लगभग 13 वर्षों से हरीश ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में हैं और पूरी तरह से बिस्तर पर निर्भर हैं। डॉक्टरों के अनुसार उनकी स्थिति में सुधार की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है।
विस्तृत सुनवाई के बाद फैसला
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई स्तरों पर सुनवाई की। अदालत ने हरीश के परिवार, चिकित्सा विशेषज्ञों और केंद्र सरकार के पक्ष को विस्तार से सुना।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल Aishwarya Bhati ने भी अदालत को बताया कि मेडिकल रिपोर्टों के अनुसार हरीश के ठीक होने की संभावना बेहद कम है।
जनवरी 2026 में अदालत ने इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जिसके बाद विस्तृत विचार-विमर्श के पश्चात यह आदेश सुनाया गया।
शेक्सपियर के कथन से शुरुआत
फैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट ने प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार William Shakespeare के प्रसिद्ध कथन “हाँ या ना” का उल्लेख किया।
अदालत ने अपने निर्णय में जीवन और मृत्यु से जुड़े व्यक्ति के अधिकारों पर चर्चा करते हुए एक्टिव और पैसिव इच्छामृत्यु के बीच अंतर स्पष्ट किया।
कोर्ट ने दोहराया कि भारत में एक्टिव इच्छामृत्यु (Active Euthanasia) पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) पर विचार किया जा सकता है, जिसमें जीवनरक्षक उपचार को वापस लिया जा सकता है।
परिवार की सराहना
अपने आदेश में अदालत ने हरीश राणा के परिवार की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने पिछले कई वर्षों तक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी उनकी देखभाल जारी रखी।
पीठ ने कहा कि परिवार ने 13 वर्षों तक हरीश का साथ नहीं छोड़ा और उनकी देखभाल के लिए हर संभव प्रयास किया।
2018 के ऐतिहासिक फैसले का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में Common Cause v. Union of India (2018) के ऐतिहासिक फैसले का भी उल्लेख किया।
इस फैसले में अदालत ने संविधान के Article 21 of the Constitution of India के तहत गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार (Right to Die with Dignity) को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी थी।
हालांकि उस समय निष्क्रिय इच्छामृत्यु को लागू करने की प्रक्रिया पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी, लेकिन हरीश राणा का मामला इस संवैधानिक बहस को आगे बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला भारत में इच्छामृत्यु, मरीज की स्वायत्तता और गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार से जुड़े कानूनों के विकास में एक महत्वपूर्ण कड़ी है।
अदालत के इस आदेश ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि गंभीर और असाध्य स्थितियों में मरीज के जीवन और मृत्यु से जुड़े निर्णयों को किस तरह संवेदनशील और कानूनी रूप से संतुलित किया जाए।
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