सुप्रीम कोर्ट ने एक वकील द्वारा खुद को हाई कोर्ट जज नियुक्त करने की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए कड़ी फटकार लगाई। सीजेआई बी.आर. गवई ने कहा, “आप सिस्टम का मजाक बना रहे हैं।” कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसी याचिकाएं दायर करने वालों का वकालत लाइसेंस रद्द किया जा सकता है।
‘सिस्टम का मजाक’: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट जज बनने की मांग वाली याचिका खारिज की, चेताया – वकालत का लाइसेंस रद्द कर देंगे
⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने खुद को हाई कोर्ट जज नियुक्त करने की याचिका को बताया “सिस्टम का मजाक”
नई दिल्ली, 3 नवंबर 2025 —
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद अजीबोगरीब याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ी नाराजगी जताई। यह याचिका जी. सरवन कुमार बनाम द रजिस्ट्रार, तेलंगाना हाई कोर्ट मामले में दायर की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता ने खुद को हाई कोर्ट का जज नियुक्त करने की मांग की थी।
मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई (CJI B.R. Gavai) और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने इस याचिका को तुरंत खारिज करते हुए कहा कि ऐसी याचिकाएं न्यायिक प्रणाली का उपहास हैं और न्यायालय के मूल्यवान समय की बर्बादी हैं।
🧑⚖️ “क्या हम यहीं कॉलेजियम Collegium बुला लें?” – CJI गवई की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता ने अपनी दलीलें रखीं, तो CJI गवई ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा,
“क्या आप चाहते हैं कि हम इस कोर्ट के पहले तीन जजों को यहीं बुलाएं और अभी कॉलेजियम की बैठक करें? आप सिस्टम का मजाक बना रहे हैं!”
पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि हाई कोर्ट जज की नियुक्ति जैसे संवैधानिक प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट की प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की मांग करना पूरी तरह अनुचित है।
मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा,
“हमने अब तक कभी इस तरह की याचिका नहीं सुनी। आखिर कितना जुर्माना लगाया जाए ऐसी याचिकाओं पर?”
⚖️ सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई, कहा – “ऐसी याचिकाओं पर लाइसेंस रद्द होना चाहिए”
जब अदालत ने याचिका को खारिज करने की मंशा जाहिर की, तो याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी।
इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कड़े शब्दों में कहा,
“ऐसी याचिकाएं दाखिल करने वाले वकीलों का वकालत करने का लाइसेंस ही रद्द कर देना चाहिए। न्यायालय के साथ इस तरह की खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
अंततः, अदालत ने याचिकाकर्ता को अनुमति देकर याचिका वापस लेने की अनुमति दी, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि इस तरह के मामलों में भविष्य में सख्त कार्रवाई की जाएगी।
📜 मामला क्या था?
याचिकाकर्ता जी सरवन कुमार, जो खुद एक अधिवक्ता हैं, ने याचिका दायर कर खुद को तेलंगाना हाई कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त करने की मांग की थी। उन्होंने यह दावा किया कि संविधान उन्हें इस तरह के अधिकार देता है, और इसलिए अदालत को आदेश जारी करना चाहिए कि उन्हें न्यायिक पद पर नियुक्त किया जाए।
हालांकि, अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा कॉलेजियम की सिफारिश पर की जाती है। किसी व्यक्ति द्वारा स्वयं की नियुक्ति की मांग करना न केवल कानूनी दृष्टि से असंभव है, बल्कि यह न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ भी है।
⚖️ अदालत का रुख: “न्यायपालिका का दुरुपयोग नहीं होने देंगे”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस तरह की “फ्रिवोलस याचिकाएं” (frivolous petitions) न्यायालय के समय और संसाधनों की बर्बादी करती हैं।
“न्यायपालिका पहले से ही भारी बोझ में है। इस तरह की निरर्थक याचिकाएं वास्तविक न्यायिक कार्य को प्रभावित करती हैं,” बेंच ने कहा।
अदालत ने कहा कि ऐसे वकीलों को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना चाहिए।
🔖 निष्कर्ष
यह मामला एक बार फिर इस बात की याद दिलाता है कि न्यायपालिका की प्रक्रिया और गरिमा का सम्मान करना हर नागरिक और वकील का कर्तव्य है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस बात का संकेत है कि न्यायालय “विचारहीन या हास्यास्पद याचिकाओं” के प्रति कोई नरमी नहीं बरतेगा।
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