जस्टिस यशवंत वर्मा का सुप्रीम कोर्ट रुख: जजेज़ इन्क्वायरी कमेटी की वैधता पर सवाल

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जस्टिस यशवंत वर्मा का सुप्रीम कोर्ट रुख: जजेज़ इन्क्वायरी कमेटी की वैधता पर सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ संसद में शुरू की गई हटाने की कार्यवाही को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा एकतरफा गठित संयुक्त जांच समिति को Judges (Inquiry) Act, 1968 और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताया।

जस्टिस यशवंत वर्मा की सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: संयुक्त जांच समिति की वैधानिकता पर संवैधानिक बहस

इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने खिलाफ संसद में आरंभ की गई हटाने की प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है। उन्होंने तीन सदस्यीय संयुक्त जांच समिति (Joint Inquiry Committee) की वैधानिकता को चुनौती देते हुए आरोप लगाया है कि लोकसभा अध्यक्ष ने Judges (Inquiry) Act, 1968 के प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए समिति का गठन एकतरफा रूप से किया।

यह याचिका उस नोटिस के लगभग दो सप्ताह बाद दायर की गई है, जो जांच समिति ने जस्टिस वर्मा को भ्रष्टाचार के आरोपों पर जवाब देने के लिए जारी किया था। इन आरोपों के चलते संसद में उनके निष्कासन की प्रक्रिया शुरू हुई है।

एकतरफा गठन और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन

जस्टिस वर्मा का तर्क है कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा Judges (Inquiry) Act, 1968 की धारा 3(2) के तहत समिति का गठन न केवल अधिनियम के विपरीत है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का भी उल्लंघन करता है। उनके अनुसार, यह समिति राज्यसभा के सभापति से अनिवार्य परामर्श के बिना गठित की गई, जबकि कानून इसकी स्पष्ट रूप से मांग करता है।

याचिका में कहा गया है कि 21 जुलाई 2025 को लोकसभा और राज्यसभा—दोनों में एक ही दिन उनके निष्कासन के लिए प्रस्ताव (notice of motion) दिया गया था। इसके बावजूद, लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त 2025 को समिति का गठन कर दिया, जबकि राज्यसभा के सभापति द्वारा प्रस्ताव को अभी तक स्वीकार (admit) ही नहीं किया गया था।

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धारा 3 की अनिवार्य प्रक्रिया

जस्टिस वर्मा ने दलील दी कि Judges (Inquiry) Act की धारा 3 हटाने की कार्यवाही के लिए एक अनिवार्य और चरणबद्ध प्रक्रिया निर्धारित करती है। यह तीन परिस्थितियों को पहचानती है—

  1. जब प्रस्ताव केवल एक सदन में लाया जाए,
  2. जब दोनों सदनों में अलग-अलग तिथियों पर प्रस्ताव लाए जाएं, और
  3. जब दोनों सदनों में एक ही दिन प्रस्ताव लाए जाएं।

वर्तमान मामले में, चूंकि दोनों सदनों में प्रस्ताव एक ही दिन दिया गया, इसलिए कानूनन यह आवश्यक था कि दोनों प्रस्ताव पहले स्वीकार किए जाएं और उसके बाद ही लोकसभा अध्यक्ष तथा राज्यसभा के सभापति संयुक्त रूप से जांच समिति का गठन करें। इन शर्तों को “आधारभूत और क्षेत्राधिकार से जुड़ी” बताते हुए जस्टिस वर्मा ने कहा कि इनके उल्लंघन से पूरी कार्यवाही शून्य हो जाती है।

सभापति पद की रिक्तता और “कानूनी असंभवता”

याचिका में एक और महत्वपूर्ण पहलू उठाया गया है। जस्टिस वर्मा ने बताया कि 21 जुलाई 2025 को ही उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के स्वास्थ्य कारणों से अचानक इस्तीफे के चलते राज्यसभा के सभापति का पद रिक्त हो गया था। ऐसे में, अधिनियम द्वारा अपेक्षित संयुक्त परामर्श और समिति गठन “कानूनी रूप से असंभव” था।

उनके अनुसार, यह प्रावधान ही इस उद्देश्य से बनाया गया है कि दोनों सदनों के बीच टकराव, समानांतर कार्यवाही और संस्थागत असमंजस से बचा जा सके।

सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही

इस मामले में जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में दलीलें पेश कीं। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के बाद लोकसभा और राज्यसभा के सचिवों (Chief Secretaries) को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

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मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी को निर्धारित की गई है—जो उस तारीख से ठीक चार दिन पहले है, जब संयुक्त जांच समिति को जस्टिस वर्मा से भ्रष्टाचार के आरोपों पर उनका जवाब मिलने की उम्मीद है।

पृष्ठभूमि

यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में उनके कार्यकाल के दौरान उनके आधिकारिक आवास से कथित रूप से बरामद अधजली और बेहिसाब नकदी से जुड़ा है। आंतरिक जांच के बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को उनके निष्कासन की सिफारिश भेजी थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट पहले ही जस्टिस वर्मा की उस याचिका को खारिज कर चुका है, जिसमें उन्होंने इन-हाउस जांच प्रक्रिया को “असंवैधानिक” बताया था।

इस दूसरी याचिका में, जस्टिस वर्मा सीधे तौर पर संसद द्वारा शुरू की गई हटाने की प्रक्रिया को चुनौती दे रहे हैं—एक ऐसी चुनौती, जो न्यायपालिका और विधायिका के संवैधानिक संतुलन पर दूरगामी प्रभाव डाल सकती है।

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