ट्रिपल तलाक नोटिस वकील के जरिए भेजना वैध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

पति के हस्ताक्षर के बिना भेजे गए तलाक नोटिस और तलाकनामा (Talaqnama) को वैध तलाक नहीं माना जा सकता।

ट्रिपल तलाक नोटिस वकील के जरिए भेजना अवैध: सुप्रीम कोर्ट ने कहा– पति के हस्ताक्षर बिना तलाकनामा मान्य नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन प्रक्रिया में वकील द्वारा भेजे गए तलाक नोटिस को अवैध बताया। अदालत ने कहा कि पति के हस्ताक्षर बिना तलाकनामा वैध नहीं; इस तरह के “नवाचार” मुस्लिम महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं। कोर्ट जल्द ही Talaq-e-Hasan की वैधता पर विस्तृत सुनवाई करेगा।


सुप्रीम कोर्ट: वकील के जरिए भेजा गया ट्रिपल तलाक नोटिस अवैध, मुस्लिम महिलाओं की गरिमा पर ‘गंभीर चोट’

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मुस्लिम पुरुषों द्वारा वकीलों के माध्यम से अपनी पत्नी को तलाक-ए-हसन (Talaq-e-Hasan) प्रक्रिया के तहत तलाक के तीन नोटिस भेजने की प्रथा पर गंभीर प्रश्न उठाए। कोर्ट ने साफ कहा कि पति के हस्ताक्षर के बिना भेजे गए तलाक नोटिस और तलाकनामा (Talaqnama) को वैध तलाक नहीं माना जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश-नामित जस्टिस सूर्यकांत, और जस्टिस उज्जल भुयाँ तथा जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी।


🔹 क्या हुआ मामला?

याचिका एक टीवी पत्रकार, बेनेज़ीर हीना, की ओर से दायर की गई थी। उनका आरोप है कि उनके पति—जो स्वयं एक अधिवक्ता हैं—ने तलाक-ए-हसन प्रक्रिया का उपयोग करते हुए:

  • एक वकील के माध्यम से
  • तीन तलाक नोटिस
  • हर नोटिस एक महीने के अंतराल पर

भेजे और बिना किसी वैध दस्तावेज़ के अपनी दूसरी शादी भी कर ली।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रिज़वान अहमद ने कहा:

“जब तलाकनामा पति के हस्ताक्षर के बिना है तो यह वैध तलाक कैसे माना जा सकता है? यदि महिला इस आधार पर दूसरी शादी करे, तो पति बाद में उस पर बहुपतित्व (polyandry) का झूठा आरोप लगा सकता है।”

उन्होंने कहा कि इस तरह के दस्तावेज़ महिलाओं को आजीवन असुरक्षा में डाल देते हैं, क्योंकि कोई भी अगला व्यक्ति भी ऐसे ‘अमान्य’ तलाकनामा को आधार बनाकर विवाह से इंकार कर सकता है।

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🔹 सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी

जब वरिष्ठ अधिवक्ता एम. आर. शामशाद ने कहा कि यह “मुस्लिम समाज में प्रचलित रिवाज़” है, तो पीठ ने तीखी प्रतिक्रिया दी:

यह कैसा वैध रिवाज़ है? तलाक नोटिस और तलाकनामा पर पति के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। तीसरा व्यक्ति कैसे पत्नी को तलाक का नोटिस दे सकता है?

क्या यह कानूनी है? ऐसे नवाचारों से मुस्लिम महिलाओं की गरिमा को क्षति पहुँचती है। यदि कल पति कह दे कि उसने वकील को अधिकृत ही नहीं किया—तो उस महिला का क्या होगा?

अदालत ने यह भी कहा:

“हमने कई मामलों में देखा है कि क्लाइंट वकील के कार्यों से ही मुकर जाते हैं। फिर ऐसी तलाक प्रक्रिया कैसे मान्य हो सकती है?”


🔹 अधिवक्ता-पति को फटकार

पीठ ने अधिवक्ता-पति के आचरण को निंदा योग्य बताते हुए कहा:

  • वह शरीयत कानूनों के अनुसार वैध तलाक प्रक्रिया अपनाएँ
  • पत्नी को वैध तलाक दें, न कि वकीलनामा-आधारित नोटिस
  • महिला और उसके बच्चे के कल्याण के लिए उचित आवेदन दाखिल करने की अनुमति दी गई

पीठ ने साहस दिखाने के लिए याचिकाकर्ता महिला को सराहा:

हम उन्हें सलाम करते हैं कि उन्होंने एकतरफा तलाक-ए-हसन प्रक्रिया को चुनौती देने का साहस जुटाया। सोचिए ग्रामीण क्षेत्रों की उन करोड़ों मुस्लिम महिलाओं का क्या होता होगा जिनके पास कोर्ट आने का साधन नहीं।


🔹 तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर विस्तृत सुनवाई होगी

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा:

राहत केवल उन महिलाओं तक सीमित नहीं रह सकती जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकती हैं। हम Talaq-e-Hasan की वैधता पर विस्तृत सुनवाई करेंगे।

यह संकेत करता है कि कोर्ट निकट भविष्य में:

  • एकतरफा तलाक
  • मुस्लिम महिलाओं के संवैधानिक अधिकार
  • तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया
  • मनमाने ‘तीन-नोटिस तलाक’
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पर व्यापक न्यायिक मानक स्थापित कर सकता है।


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