सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा महीनों तक फैसले सुरक्षित रखकर सार्वजनिक न करने की प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी की। CJI सूर्यकांत ने इसे न्यायपालिका की ‘चिह्नित बीमारी’ बताते हुए समय पर न्याय सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया।
समय पर न्याय की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हाई कोर्ट द्वारा फैसलों को महीनों तक सुरक्षित रखकर सार्वजनिक न करने की प्रथा पर तीखी टिप्पणी की। अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था की एक “चिह्नित बीमारी” करार देते हुए कहा कि इसे खत्म किया जाना चाहिए और आगे फैलने नहीं दिया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें शिकायत की गई थी कि झारखंड हाई कोर्ट ने 4 दिसंबर 2024 को एक याचिका खारिज करते हुए मौखिक रूप से फैसला सुनाया था, लेकिन अब तक उसका लिखित आदेश अपलोड नहीं किया गया है।
पीठ ने निर्देश दिया कि अगले सप्ताह के अंत तक पूरा फैसला वकील को उपलब्ध कराया जाए।
“कानून की गरिमा से खिलवाड़”
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने देरी पर कड़ा ऐतराज जताते हुए कहा,
“ऐसा लगता है कि सिर्फ जुबानी जमा-खर्च किया जा रहा है। कोई संदेश जाना चाहिए। यह कानून की गरिमा के साथ खिलवाड़ जैसा है।”
“दो तरह के जस्टिस होते हैं” — CJI
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक कार्यशैली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि मोटे तौर पर दो तरह के जज होते हैं—
“एक मेहनती न्यायाधीश, जो सभी पक्षों को सुनते हैं और 10–15 मामलों में भी फैसला सुरक्षित रखते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो उसके बाद फैसले सुनाते ही नहीं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका के सामने मौजूद एक संरचनात्मक चुनौती पर है।
“यह एक पहचानी हुई बीमारी है। इसका इलाज होना चाहिए। इसे खत्म करना होगा और फैलने नहीं दिया जा सकता।”
‘सुनवाई के बाद लिस्टिंग’ की प्रवृत्ति पर भी सवाल
CJI ने एक अन्य आम चलन की ओर भी ध्यान दिलाया, जिसमें दलीलें सुनने के बाद मामलों को ‘आगे के निर्देशों’ के लिए सूचीबद्ध कर दिया जाता है, लेकिन निर्णय नहीं सुनाया जाता। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को वह हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के साथ होने वाली आगामी बैठक में उठाएंगे।
संदेश साफ
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से यह स्पष्ट संदेश गया है कि फैसलों में अनावश्यक देरी न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है, और न्यायपालिका को आत्ममंथन कर इस प्रवृत्ति पर प्रभावी रोक लगानी होगी।
Tags / टैग्स
#सुप्रीमकोर्ट #न्यायिक_देरी #हाईकोर्ट #फैसला_अपलोड #समयपर_न्याय #SupremeCourt #JudicialDelay #HighCourt #ReservedJudgments #AccessToJustice
